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पुनर्गठन के बाद भी लागू रहेगा जन सुरक्षा कानून: अदालत की मुहर

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने साल 2019 के पुनर्गठन अधिनियम के बाद भी जन सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) की संवैधानिक वैधता को पूरी तरह बरकरार रखा है।

By अजय त्यागी 1 min read
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प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक विधिक फैसला सुनाते हुए केंद्र शासित प्रदेश में जम्मू-कश्मीर जन सुरक्षा अधिनियम, 1978 के अनुकूलित प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को पूरी तरह से बरकरार रखा है। अदालत ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट रूप से स्पष्ट किया है कि साल 2019 में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के लागू होने के बाद भी यह विशेष सुरक्षा कानून विधिक रूप से पूरी तरह प्रभावी और लागू रहेगा। उच्च न्यायालय के विद्वान न्यायाधीश जस्टिस वसीम सादिक नरगाल की एकल पीठ ने उस विधिक याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें साल 2019 में जम्मू-कश्मीर को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठित किए जाने के बाद इस जन सुरक्षा कानून को जारी रखने की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। अदालत ने अपने आदेश में यह साफ कर दिया कि इस कानून की निरंतरता में कोई भी विधिक त्रुटि या असंवैधानिकता मौजूद नहीं है।

पुनर्गठन अधिनियम की धारा 95 और 96 के तहत मिली विधिक शक्ति

इस पूरे मामले की बारीक विधिक व्याख्या करते हुए उच्च न्यायालय की पीठ ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 की धारा 95 और 96 स्पष्ट रूप से तत्कालीन राज्य में पहले से मौजूद कानूनों की निरंतरता और उनके आवश्यक प्रशासनिक अनुकूलन को पूर्ण विधिक शक्ति प्रदान करती हैं। अदालत ने कहा कि देश की संसद ने स्वयं एक अत्यंत सुदृढ़ और संपूर्ण विधिक ढांचा तैयार किया था, ताकि नए प्रशासनिक स्वरूप और आवश्यकताओं के अनुसार पुराने कानूनों को बिना किसी बाधा के जारी रखा जा सके और जहां भी आवश्यक हो, उनमें उचित विधिक संशोधन किए जा सकें। अदालत ने इस वैधानिक व्यवस्था को स्पष्ट करते हुए अपने आधिकारिक फैसले में कहा कि, “जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 की धारा 95 और 96 का ध्यानपूर्वक अध्ययन करने से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि संसद ने स्वयं पुनर्गठन अधिनियम बनाते समय, न केवल तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य पर लागू Braxton मौजूदा कानूनों की निरंतरता के लिए बल्कि उनके अनुकूलन और संशोधन के लिए भी सचेत रूप से एक संपूर्ण वैधानिक तंत्र प्रदान किया था।”

केंद्र सरकार को प्राप्त सीमित विधिक शक्तियों का समर्थन

अदालत ने विधिक सुनवाई के दौरान 31 मार्च 2020 को जारी किए गए आधिकारिक वैधानिक आदेश एस.ओ. 1229 ई का भी विशेष रूप से संदर्भ दिया, जिसके माध्यम से जन सुरक्षा अधिनियम में प्रयुक्त पुराने शब्द राज्य को प्रतिस्थापित करके उसके स्थान पर जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश शब्द को विधिक रूप से जोड़ा गया था। अदालत ने याचिकाकर्ता की इस दलील को पूरी तरह से खारिज कर दिया कि इस प्रकार का महत्वपूर्ण और बड़ा भाषाई प्रतिस्थापन या प्रशासनिक बदलाव करने की शक्ति केवल देश की संसद के पास ही सुरक्षित है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह अनुकूलन पूरी तरह से कानून सम्मत और विधिक रूप से प्राधिकृत था। इस विषय पर कड़ा रुख अपनाते हुए पीठ ने अपने आदेश में कहा कि, “यह तर्क कि केवल संसद ही ऐसा प्रतिस्थापन कर सकती थी, इस तथ्य की अनदेखी करता है कि संसद ने स्वयं, पुनर्गठन अधिनियम की धारा 96 के बल पर, केंद्र सरकार को अनुकूलन की ऐसी सीमित शक्ति सौंपी थी।”

कानून के मूल चरित्र और कार्यात्मक उद्देश्य पर कोई प्रभाव नहीं

जस्टिस वसीम सादिक नरगाल की पीठ ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि इस प्रकार के शाब्दिक अनुकूलन या प्रशासनिक संशोधनों से जम्मू-कश्मीर जन सुरक्षा अधिनियम, 1978 के मूल चरित्र, अंतर्निहित कार्यात्मक नीति या उसके मुख्य कानूनी उद्देश्यों में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आता है। अदालती फैसले के अनुसार, राज्य शब्द के स्थान पर केंद्र शासित प्रदेश शब्द को शामिल करना केवल साल 2019 के पुनर्गठन के कारण उत्पन्न हुआ एक आवश्यक और परिणामी प्रशासनिक बदलाव था, जिससे इस सुरक्षा कानून के कामकाज, विधिक संचालन या इसके मूल विधायी उद्देश्य पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है। उच्च न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी कि यदि याचिकाकर्ता की इस विधिक चुनौती को स्वीकार कर लिया जाता, तो इससे पुनर्गठन अधिनियम के तहत प्रदान किए गए पूरे कानूनी अनुकूलन तंत्र का विधिक आधार ही कमजोर हो जाता और इस प्रक्रिया के तहत किए गए अन्य सभी वैधानिक संशोधनों की वैधता भी संदेह के घेरे में आ जाती।

बारामूला के नजरबंद नागरिक की याचिका कोर्ट से खारिज

यह पूरा विधिक विवाद बारामूला के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा बोमई ज़ैंगीर के निवासी तनवीर अहमद मीर के खिलाफ जन सुरक्षा अधिनियम के तहत जारी किए गए एक नजरबंदी आदेश को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से न्यायालय के समक्ष आया था। याचिकाकर्ता के वकील ने इस नजरबंदी के विधिक आधारों और पीएसए कानून की निरंतरता दोनों को अदालत में चुनौती दी थी। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस पूरे मामले के सभी विधिक और सुरक्षात्मक पहलुओं की बहुत गहराई से जांच करने के बाद याचिकाकर्ता की दलीलों को पूरी तरह से खारिज कर दिया। अदालत ने इस नजरबंदी आदेश को कानून सम्मत बताते हुए याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया और अपने अंतिम फैसले में स्पष्ट रूप से घोषणा की कि जन सुरक्षा अधिनियम की संवैधानिक वैधता को दी गई यह चुनौती पूरी तरह से योग्यता से परे और विधिक आधारों से शून्य है।[1]

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

यह समाचार रिपोर्ट जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय द्वारा जन सुरक्षा अधिनियम की संवैधानिक वैधता के संबंध में दिए गए समसामयिक विधिक फैसले, माननीय न्यायाधीश के आधिकारिक आदेशों और विभिन्न प्रतिष्ठित राष्ट्रीय विधिक समाचार एजेंसियों द्वारा उपलब्ध कराए गए प्रामाणिक तथ्यों पर पूरी तरह आधारित है। इस अत्यंत संवेदनशील विधिक और सुरक्षा संबंधी विषय से जुड़े किसी भी प्रकार के वैधानिक संदर्भ, अधिनियम की धाराओं की व्याख्या या अंतिम न्यायिक निष्कर्षों के लिए माननीय उच्च न्यायालय द्वारा जारी मूल हस्ताक्षरित निर्णय की प्रति को ही अंतिम और प्रामाणिक माना जाना चाहिए। इस लेख का मुख्य उद्देश्य पाठकों को देश के न्यायिक घटनाक्रमों की निष्पक्ष जानकारी प्रदान करना है। लेखक और प्रकाशक/संपादक इस रिपोर्ट के आधार पर होने वाले किसी भी व्यक्तिगत, सामाजिक, राजनैतिक या कानूनी निर्णय के परिणामों के लिए किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं हैं।

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