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मणिपुर से अफ्रीका और अब भारत वापसी: सैटेलाइट ट्रैकिंग में बड़ा खुलासा

दक्षिणी अफ्रीका से छह हजार किलोमीटर की नॉन-स्टॉप विधिक यात्रा कर दो सैटेलाइट-टैग्ड अमूर फाल्कन पक्षी भारत वापस लौट रहे हैं।

By अजय त्यागी 1 min read
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वापस लौट रहे दो प्रवासी पक्षी

भारत में लुप्तप्राय प्रजातियों और प्रवासी पक्षियों के संरक्षण की दिशा में एक अत्यंत उत्साहजनक और ऐतिहासिक सफलता सामने आई है। पिछले साल नवंबर के महीने में पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में सैटेलाइट ट्रांसमीटर चिप से लैस किए गए तीन अमूर फाल्कन पक्षियों में से दो पक्षी दक्षिणी अफ्रीका के अपने शीतकालीन प्रवास स्थलों से वापस भारत लौट रहे हैं। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस विस्मयकारी और ऐतिहासिक घटनाक्रम की प्रामाणिक जानकारी देशवासियों के साथ साझा की है। उन्होंने बताया कि इन अद्भुत और छोटे शिकारी पक्षियों ने केवल छह दिनों के भीतर लगभग छह हजार किलोमीटर की बेहद कठिन और निरंतर हवाई दूरी तय की है। विधिक और वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, वापस लौट रहे इन दो प्रवासी पक्षियों में से एक पक्षी वर्तमान में सीधे तौर पर भारत के पश्चिमी तट की ओर तेजी से बढ़ रहा है, जो वन्यजीव वैज्ञानिकों के लिए बेहद कौतूहल और अध्ययन का विषय बना हुआ है।

मणिपुर के स्थानीय जिले में की गई थी विधिक टैगिंग

इस पूरे वैज्ञानिक प्रोजेक्ट की पृष्ठभूमि को रेखांकित करते हुए केंद्रीय मंत्री ने अपने आधिकारिक वक्तव्य में स्पष्ट रूप से बताया कि, “इन अमूर फाल्कन पक्षियों को पिछले साल नवंबर में मणिपुर के पहाड़ी जिले के अंतर्गत आने वाले उनके प्रसिद्ध विश्राम स्थल चिउलुआन गाँव में विधिक रूप से सैटेलाइट-टैग्ड किया गया था।” पर्यावरण मंत्रालय के वित्तपोषण और भारतीय वन्यजीव संस्थान के सहयोग से चलाए जा रहे इस विशेष प्रोजेक्ट के तहत इन पक्षियों की पीठ पर बेहद हल्के वजन के ट्रांसमीटर विधिक रूप से लगाए गए थे ताकि वैश्विक स्तर पर उनके लंबे प्रवास मार्ग का सटीक और त्रुटिहीन वैज्ञानिक अध्ययन किया जा सके। दक्षिणी अफ्रीका के गैर-प्रजनन वाले घास के मैदानों और मैदानी इलाकों में चार महीने से अधिक का लंबा समय बिताने के बाद, इन तीन में से दो अमूर फाल्कन अब अपनी वसंत ऋतु की वापसी यात्रा पर निकल चुके हैं, जिसे वैज्ञानिक भाषा में स्प्रिंग माइग्रेशन कहा जाता है। ये पक्षी भारत के रास्ते सुदूर पूर्व एशिया में स्थित अपने मूल प्रजनन क्षेत्रों की ओर विधिक रूप से अग्रसर हैं।

सोमालिया से भारत तक छह दिनों की ऐतिहासिक नॉन-स्टॉप उड़ान

केंद्रीय मंत्री ने इन छोटे पक्षियों की शारीरिक सहनशक्ति और विस्मयकारी विधिक क्षमता की सराहना करते हुए आगे बताया कि, “सोमालिया के तटों को पार करके पूर्वोत्तर भारत तक पहुँचने के दौरान ये पक्षी छह दिनों में लगभग छह हजार किलोमीटर की लगातार और बिना रुके उड़ान भरते हैं।” यह पूरी यात्रा इसलिए भी हैरतअंगेज मानी जाती है क्योंकि अमूर फाल्कन मूल रूप से स्थलीय पक्षी हैं, जो समंदर के पानी पर कभी नहीं बैठ सकते। केंद्रीय मंत्री के आधिकारिक विधिक विवरण के अनुसार, अलंग नाम की एक युवा मादा अमूर फाल्कन वर्तमान में पूरी दृढ़ता के साथ भारत के पश्चिमी तटीय क्षेत्र की ओर बढ़ रही है। इस नन्ही मादा पक्षी ने कल सुबह-सुबह सोमालिया के तटों से अपनी विधिक उड़ान शुरू की थी और वह वर्तमान में अरब सागर को पार करने के बेहद जोखिम भरे और कठिन समुद्री चरण में है, जहां उसे लगातार आसमान में ही रहना होगा।

अनुकूल हवाओं का सहारा और समुदाय आधारित संरक्षण की बड़ी सफलता

मौसम और वैज्ञानिक ट्रैकिंग डेटा का हवाला देते हुए केंद्रीय मंत्री ने आगे कहा कि, “वर्तमान में, अनुकूल टेलविंड्स यानी पीछे से आने वाली मददगार हवाओं के कारण, यह समुद्री यात्रा तीन दिनों तक बिना रुके लगातार जारी रहेगी।” केंद्रीय मंत्री ने देश के समक्ष यह विधिक तथ्य भी रखा कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के पूर्ण वित्तीय सहयोग से संचालित यह महत्वाकांक्षी ट्रैकिंग प्रोजेक्ट भारत में स्थानीय समुदायों के नेतृत्व में किए जाने वाले सबसे सफल विधिक संरक्षण प्रयासों में से एक बनकर उभरा है। इस परियोजना के माध्यम से इस अद्भुत, छोटे और बेहद शक्तिशाली शिकारी पक्षी के बारे में कई अभूतपूर्व और महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारियां प्राप्त हुई हैं। दो अलग-अलग गोलार्धों के बीच लंबी दूरी तय करने वाले इस अंतर-गोलीय प्रवासी पक्षी के व्यवहार ने भविष्य के वन्यजीव प्रबंधन और विधिक संरक्षण प्रयासों को एक नई और व्यावहारिक दिशा प्रदान की है, जिससे स्थानीय शिकार पर पूरी तरह रोक लगी है।[1]

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

यह समाचार रिपोर्ट पर्यावरण मंत्रालय के माननीय मंत्री द्वारा सोशल मीडिया पर जारी आधिकारिक विधिक बयानों, वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक ट्रैकिंग आंकड़ों और विभिन्न राष्ट्रीय समाचार सोर्सेज द्वारा उपलब्ध कराए गए प्राथमिक तथ्यों पर पूरी तरह आधारित है। इस संवेदनशील पारिस्थितिक और प्रवासी पक्षी संरक्षण मामले से जुड़े किसी भी प्रकार के वैधानिक संदर्भ, तकनीकी ट्रैकिंग डेटा या सरकारी नीतिगत फैसलों के लिए पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी मूल विधिक प्रेस विज्ञप्ति को ही अंतिम और प्रामाणिक माना जाना चाहिए। इस लेख का मुख्य उद्देश्य पाठकों को देश के पर्यावरण और वन्यजीव विकास की निष्पक्ष जानकारी प्रदान करना है। लेखक और प्रकाशक/संपादक इस रिपोर्ट के आधार पर होने वाले किसी भी व्यक्तिगत, सामाजिक, विधिक या पर्यावरणीय निर्णय के परिणामों के लिए किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं हैं।

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