भारत ने सिंधु जल संधि के संबंध में मध्यस्थता अदालत के कथित नए फैसले को विधिक रूप से अवैध और पूरी तरह शून्य घोषित कर दिया है।
Baglihar Hydroelectric Power Project
भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक बेहद कड़ा और स्पष्ट विधिक रुख अपनाते हुए सिंधु जल संधि के संबंध में स्थायी मध्यस्थता अदालत द्वारा गठित न्यायाधिकरण के नए फैसले को पूरी तरह से सिरे से खारिज कर दिया है। नई दिल्ली स्थित विदेश मंत्रालय ने साफ तौर पर दोहराया है कि वह इस तथाकथित पंचाट की विधिक वैधता, क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार या इसकी किसी भी प्रकार की न्यायिक क्षमता को बिल्कुल भी मान्यता नहीं देता है।
मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पड़ोसी देश की आतंकी गतिविधियों के कारण इस द्विपक्षीय जल समझौते को भारत द्वारा पहले ही विधिक रूप से स्थगित रखा गया है, और वह निर्णय वर्तमान में भी पूरी ताकत के साथ प्रभावी है। भारत का यह कड़ा स्टैंड आतंकवाद के खिलाफ उसकी शून्य सहिष्णुता की राष्ट्रीय नीति के बिल्कुल अनुकूल है।
इस वैश्विक और संवेदनशील मुद्दे पर मीडिया द्वारा पूछे गए तीखे सवालों का लिखित जवाब देते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर देश की विधिक स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट किया है। उन्होंने अपने आधिकारिक वक्तव्य में तीखा प्रहार करते हुए साफ तौर पर लिखा कि, “गैर-कानूनी ढंग से गठित इस तथाकथित मध्यस्थता अदालत ने सिंधु जल संधि की सामान्य व्याख्या के मुद्दों पर दिए गए पुराने फैसले के पूरक के रूप में अधिकतम जल भंडारण के विषय पर एक कथित नया निर्णय जारी किया है।”
उन्होंने आगे कहा कि, “भारत इस वर्तमान कथित फैसले को पूरी तरह खारिज करता है, ठीक उसी तरह जैसे उसने इस अवैध रूप से गठित संस्था के सभी पूर्ववर्ती बयानों और फैसलों को दृढ़ता से खारिज किया था।” भारत ने इस पूरी प्रक्रिया से खुद को हमेशा दूर रखा है।
भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में अपनी बात रखते हुए कहा है कि इस विवाद निवारण निकाय का जमीनी ढांचा ही विधिक रूप से दूषित है। प्रवक्ता ने अपने बयान में आगे स्पष्ट करते हुए कहा कि, “भारत ने इस तथाकथित अदालत की स्थापना को कभी भी विधिक रूप से स्वीकार नहीं किया है; इसलिए इसके द्वारा जारी की गई कोई भी विधिक कार्यवाही, निर्णय या आदेश पूरी तरह से शून्य और प्रभावहीन माना जाएगा।”
भारत का यह भी कहना है कि इस संधि को वर्तमान में पूरी तरह से स्थगित रखने का उसका संप्रभु विधिक निर्णय आगे भी पूरी तरह से लागू रहेगा। भारतीय राजनयिकों का तर्क है कि इस तरह के किसी भी न्यायाधिकरण का गठन स्वयं मूल समझौते की विधिक शर्तों का बहुत बड़ा उल्लंघन है।
उल्लेखनीय है कि भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1960 में हस्ताक्षरित यह ऐतिहासिक द्विपक्षीय सिंधु जल समझौता दोनों देशों के बीच कुल छह प्रमुख नदियों के पानी के बंटवारे का विधिक नियमन करता है। नीदरलैंड के द हेग शहर में स्थित स्थायी मध्यस्थता अदालत के नियमों के तहत पाकिस्तान ने इस मामले को जबरन वैश्विक मंच पर उठाने का प्रयास किया था।
भारत का आधिकारिक और विधिक पक्ष यह है कि यह न्यायाधिकरण पूरी तरह से अवैध है, क्योंकि यह मूल संधि के भीतर बताए गए आंतरिक विवाद समाधान तंत्र का सीधे तौर पर उल्लंघन करता है। मूल नियमों के अनुसार किसी भी मतभेद की स्थिति में दोनों पक्षों की सहमति से केवल एक तटस्थ विशेषज्ञ की नियुक्ति को ही विधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए, न कि किसी बाहरी एकतरफा अदालत को।[1]
यह समसामयिक समाचार रिपोर्ट भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक विधिक बयानों, अंतरराष्ट्रीय संधियों के वैधानिक नियमों और प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार सोर्सेज द्वारा उपलब्ध कराए गए प्राथमिक तथ्यों पर पूरी तरह आधारित है। इस द्विपक्षीय जल संधि के तकनीकी प्रावधानों, सीमा पार विधिक क्षेत्राधिकार या सरकार के संप्रभु नीतिगत फैसलों की अंतिम वैधानिक व्याख्या के लिए विदेश मंत्रालय द्वारा जारी मूल प्रेस विज्ञप्ति को ही प्रामाणिक माना जाना चाहिए। इस लेख का मुख्य उद्देश्य केवल जनहित में देश की विदेश नीति की निष्पक्ष जानकारी प्रदान करना है। लेखक और प्रकाशक/संपादक इस रिपोर्ट के आधार पर होने वाले किसी भी व्यक्तिगत, सामाजिक या कानूनी निर्णय के परिणामों के लिए किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं हैं।