अमृतसर में अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने सिखों के संघर्ष और गुरु के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा को याद किया है।
जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज
पंजाब के पवित्र शहर अमृतसर में स्थित सिख कौम की सर्वोच्च धार्मिक पीठ अकाल तख्त साहिब से एक बेहद महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी संदेश जारी किया गया है। जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने सिख इतिहास के सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण दौर को याद करते हुए कौम को अपनी जड़ों से जुड़े रहने का आह्वान किया। इस विशेष संबोधन के दौरान उन्होंने प्राचीन काल में सिखों पर हुए अत्याचारों और उनके अभूतपूर्व जुझारू संकल्प की विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि कैसे सिख योद्धाओं ने धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी।
अपने संबोधन के मुख्य अंश में जत्थेदार ने इतिहास के क्रूर पन्नों का उल्लेख करते हुए दमनकारी ताकतों के अत्याचारों को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अतीत में सिखों के अस्तित्व को समूल नष्ट करने के लिए किस प्रकार के घृणित और सुनियोजित प्रयास किए गए थे।
अकाल तख्त साहिब के मुख्य सेवादार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने भरे मन से ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए अपने आधिकारिक बयान में कहा कि, “लखपत राय जैसे अत्याचारियों ने सिखों के अस्तित्व को पूरी तरह मिटाने के लिए जंगलों तक में आग लगवा दी थी और यहाँ तक कि रोजमर्रा के जीवन में ग्रंथ जैसे सामान्य शब्दों के उपयोग पर भी पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था।”
इतने भीषण और अमानवीय दमन के बावजूद सिख समुदाय ने कभी भी अपने कदम पीछे नहीं खींचे। जत्थेदार ने वर्तमान पीढ़ी को याद दिलाया कि विपरीत परिस्थितियों में भी सिख कौम का मनोबल कभी नहीं टूटा और वे अपने मार्ग पर हमेशा अडिग बने रहे।
उन्होंने ऐतिहासिक सच्चाई को पूरी दृढ़ता से दोहराते हुए आगे कहा कि, “इन सब क्रूर अत्याचारों के बावजूद, सिखों ने सबसे कठिन और भीषण समय के दौरान भी अपने गुरु का साथ कभी नहीं छोड़ा और अपने पावन सिद्धांतों के प्रति हमेशा वफादार बने रहे।” यह बयान आज के दौर में भी प्रासंगिक है।
सिख इतिहास के इस विशिष्ट कालखंड को याद करने का मुख्य उद्देश्य आज के युवाओं में अपने गौरवशाली इतिहास के प्रति स्वाभिमान जगाना है। जत्थेदार ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि उन्हें यह धार्मिक स्वतंत्रता और सम्मान कितनी बड़ी कुर्बानियों के बाद हासिल हुआ है। जंगलों में रहकर और कष्ट सहकर भी पूर्वजों ने मर्यादा को जीवित रखा। अकाल तख्त साहिब से जारी इस संदेश ने देश और विदेश में रह रहे पूरे सिख समुदाय को झकझोर कर रख दिया है और उन्हें आत्ममंथन करने की राह दिखाई है।
इस संबोधन के समापन पर जत्थेदार ने समस्त पंथ से एकजुट रहने और गुरुग्रंथ साहिब के सिद्धांतों पर चलने की अपील की। उन्होंने कहा कि इतिहास हमें विपरीत परिस्थितियों से लड़ना और धर्म पर टिके रहना सिखाता है।
अमृतसर के स्थानीय विद्वानों ने भी इस ऐतिहासिक संदेश की सराहना करते हुए कहा कि, “अकाल तख्त साहिब से आने वाली यह आवाज हमेशा कौम को सही दिशा दिखाती है और संकट के समय एक नई ऊर्जा का संचार करती है।” इस संबोधन के बाद शिरोमणि कमेटी और अन्य धार्मिक संगठनों ने भी इतिहास के इन पन्नों को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया है।[1]
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Amritsar, Punjab: Akal Takht Sahib Jathedar Giani Kuldeep Singh Gargaj says, "...Tyrants like Lakhpat Rai had set forests on fire to wipe out the very existence of Sikhs and had even banned the use of words like ‘gud’ and ‘granth’. Despite this, Sikhs did not abandon the Guru… pic.twitter.com/kylDituqMr
— IANS (@ians_india) May 17, 2026