सुप्रीम कोर्ट में पुजारियों के न्यूनतम वेतन और सम्मानजनक लाभ देने संबंधी याचिका पर आज सुनवाई होगी। पुजारियों, अर्चकों तथा सेवादारों के हक की बात होगी।
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
देश के विभिन्न राज्यों में सरकारी नियंत्रण वाले हिंदू धार्मिक देवस्थानों और बड़े मंदिरों के सुचारू संचालन से जुड़े पुजारियों, अर्चकों तथा सेवादारों के मानवीय अधिकारों को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत एक बेहद महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रही है। सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को उस जनहित याचिका (पीआईएल) पर विस्तृत सुनवाई होने वाली है, जिसमें विभिन्न राज्य सरकारों के अधीन संचालित होने वाले भव्य मंदिरों में कार्यरत पुजारियों, सेवादारों और अन्य चतुर्थ श्रेणी मंदिर कर्मचारियों को दिए जाने वाले मासिक वेतन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों की व्यापक समीक्षा करने के लिए एक उच्च स्तरीय न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग पुरजोर तरीके से की गई है।
न्यायपालिका के गलियारों से प्राप्त आधिकारिक रोस्टर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की संयुक्त खंडपीठ प्रसिद्ध अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से दायर इस देशव्यापी जनहित याचिका पर गंभीर सुनवाई करने वाली है।
याचिकाकर्ता ने केंद्र और राज्य सरकारों की दोहरी नीतियों को चुनौती देते हुए अदालत से मूक खड़े पुजारियों के आर्थिक हितों की रक्षा के लिए तत्काल एक स्वतंत्र विनियामक ढांचा तैयार करने की विधिक प्रार्थना की है।
याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने अपनी इस याचिका में श्रम कानूनों का कड़ाई से हवाला देते हुए कोर्ट के समक्ष कई महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न खड़े किए हैं।
उन्होंने मुख्य रूप से मांग की है कि सभी धार्मिक सेवादारों को "वेतन संहिता, 2019" की धारा 2(के) के तहत विधिक रूप से सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिया जाना चाहिए। याचिका में ठोस तर्क दिया गया है कि जब भी कोई राज्य सरकार किसी प्राचीन या ऐतिहासिक मंदिर का संपूर्ण प्रशासनिक और आर्थिक नियंत्रण अपने हाथ में ले लेती है, तो स्वतः ही वहां विधिक रूप से मालिक और कर्मचारी का गहरा रिश्ता स्थापित हो जाता है।
याचिका में पुजारियों के बुनियादी मानवाधिकारों की पैरवी करते हुए राज्य सरकारों की वर्तमान आर्थिक नीतियों की विसंगतियों को देश के समक्ष रखा गया है।
याचिका के अनुसार, “ऐसी स्थिति में धार्मिक अनुष्ठान करने वाले पुजारियों को एक सम्मानजनक मासिक वेतन न देना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत देश के प्रत्येक नागरिक को मिले गरिमापूर्ण जीवन जीने के मौलिक अधिकार का सीधा और स्पष्ट उल्लंघन है।” राज्य को अपनी इस मनमानी नीति को तुरंत बदलना होगा।
सुप्रीम कोर्ट में पुजारियों के विषय में दायर इस देशव्यापी याचिका की पृष्ठभूमि के बारे में बताते हुए मुख्य याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने एक मीडिया साक्षात्कार में अपनी वाराणसी यात्रा के अनुभवों को साझा किया।
उन्होंने बताया कि इस कानूनी मामले की शुरुआत वास्तव में 4 अप्रैल को हुई थी, जब वे उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित सुप्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर में एक धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होने गए थे। वहां गर्भगृह में दर्शन-पूजन करने के बाद उन्हें जमीनी स्तर पर पता चला कि करोड़ों का राजस्व देने वाले इस भव्य मंदिर के पुजारियों और ग्राउंड स्टाफ को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए बुनियादी न्यूनतम वेतन भी नहीं मिल पाता है।
सुप्रीम कोर्ट में पुजारियों के विषय में दायर याचिका में उत्तर भारत के अलावा दक्षिण भारतीय राज्यों जैसे आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती विभागों (एंडोमेंट डिपार्टमेंट) की कार्यप्रणाली का भी विशेष रूप से जिक्र किया गया है।
वहां हाल ही में हजारों पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों ने न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर सड़कों पर उतरकर एक बहुत बड़ा विरोध प्रदर्शन किया था। याचिका के अनुसार, “इन धार्मिक विशेषज्ञों को वर्तमान में अकुशल या अर्ध-कुशल मजदूरों के लिए तय सरकारी न्यूनतम मजदूरी भी नसीब नहीं हो रही है, जो कि सरासर एक तरह का बंधुआ शोषण है।”
याचिका के अंतिम हिस्से में मदुरै के प्रसिद्ध दंडायुथपाणि स्वामी मंदिर में बीते 7 फरवरी 2025 को जारी किए गए एक दमनकारी सर्कुलर का भी प्रामाणिक उल्लेख किया गया है।
सर्कुलर में पुजारियों को भक्तों की आरती की थाली से दक्षिणा लेने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई थी, जिससे उनके सामने भुखमरी का खतरा पैदा हो गया था। याचिका में कड़ा प्रहार करते हुए कहा गया है कि राज्य एक आदर्श नियोक्ता के रूप में काम करने के बजाय न्यूनतम मजदूरी अधिनियम और नीति निर्देशक सिद्धांतों के अनुच्छेद 43 का खुला उल्लंघन कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में अब इस विसंगति पर अंतिम विधिक निर्णय होना बाकी है।(1)
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