तलाक के मुक़दमे में बच्चे की भावनात्मक अपील ने बदला कोर्ट का रुख। मासूम की बात पर कस्टडी मां को मिली लेकिन पिता के अधिकार भी रहे सुरक्षित।
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
तलाक के मुक़दमे में बच्चे की भावनात्मक अपील ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि कानूनी लड़ाइयों के बीच सबसे ज्यादा नुकसान मासूमों का होता है। हाल ही में एक पारिवारिक मामले की सुनवाई के दौरान सात वर्षीय बच्चे की मार्मिक बातों ने अदालत को न केवल चौंकाया, बल्कि कस्टडी संबंधी फैसले की दिशा भी बदल दी। बच्चे ने न्यायाधीश के सामने साफ कहा कि वह अपने माता-पिता के बीच चल रहे इस विवाद से बेहद दुखी है और किसी भी सूरत में इस माहौल से बाहर निकलना चाहता है।
न्यायालय ने अभिभावक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 के तहत दायर इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया। सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता देते हुए कस्टडी उसकी मां को सौंपने का निर्णय लिया। यह निर्णय केवल कानून के पन्नों पर आधारित नहीं था, बल्कि एक बच्चे की उस पुकार पर आधारित था जो अपनी खुशी और स्थिरता की तलाश में अदालत की दहलीज तक पहुंच गया था।[1]
वर्ष 2015 में हुआ यह प्रेम विवाह, कोविड काल तक सामान्य चलता रहा, लेकिन 2022 के बाद रिश्तों में आई दूरियां कड़वाहट में बदल गईं। मां का कनाडा में बसना और पिता का पुणे में नौकरी करना, पारिवारिक दूरी को और बढ़ा गया। जब विवाद बढ़ा, तो आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ। मां ने पति पर विवाहेतर संबंधों का आरोप लगाया, वहीं पिता ने तर्क दिया कि बच्चे को विदेश ले जाने से उनकी पितृत्व की डोर कमजोर हो जाएगी।
अदालत ने पहले दोनों पक्षों में आपसी सहमति बनाने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। ऐसे में बच्चे की मनःस्थिति को समझना अनिवार्य हो गया था। तलाक के मुक़दमे में बच्चे की भावनात्मक अपील ने अदालत के लिए यह स्पष्ट कर दिया कि बच्चे के लिए घर का माहौल कितना तनावपूर्ण बन चुका था। कानून की नजर में यह बच्चा अब किसी भी पक्ष का मोहरा नहीं, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति है जिसके अपने विचार और भावनाएं हैं।
अदालत ने प्रक्रिया का पालन करते हुए बच्चे के साथ चैंबर में करीब 20 मिनट तक एकांत में बातचीत की। इस दौरान बच्चा अपनी भावनाओं को छुपा नहीं सका और उसने अपनी पीड़ा व्यक्त की। न्यायाधीश अमित शर्मा ने इस संवाद का जिक्र करते हुए कहा कि कस्टडी के मामलों में बच्चे की पसंद और उसकी मानसिक भलाई को नजरअंदाज करना अन्याय के समान है। यह संवाद इस पूरे मामले का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
"बच्चे के स्वस्थ मानसिक विकास के लिए मां और पिता दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यदि साथ रहना संभव न हो, तो ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जहां बच्चा अधिक सुरक्षित, खुश और संतुष्ट महसूस करे।" - प्रो. (सेवानिवृत्त) आरती बख्शी, मनोवैज्ञानिक
अदालत ने पाया कि मां का वर्क-फ्रॉम-होम का लचीला समय बच्चे की देखभाल के लिए अधिक उपयुक्त है। इसके विपरीत, पिता की व्यस्त दिनचर्या बच्चे को पर्याप्त समय देने में असमर्थ थी। इस प्रकार, तलाक के मुक़दमे में बच्चे की भावनात्मक अपील ने न केवल बच्चे को एक सुरक्षित भविष्य दिया, बल्कि पिता के मिलने के अधिकारों को भी कानूनी रूप से संरक्षित किया ताकि बच्चा पिता के प्यार से वंचित न रहे।
यह फैसला समाज के लिए एक बड़ा संदेश है। माता-पिता को समझना होगा कि कानूनी लड़ाई जीतना बच्चे के बचपन की कीमत पर नहीं होना चाहिए। कानून के सामने जब तलाक के मुक़दमे में बच्चे की भावनात्मक अपील सामने आती है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि न्याय के तराजू में बच्चे की मानसिक शांति सबसे ऊपर है। अदालत का यह रुख आने वाले समय में पारिवारिक मुकदमों में एक सकारात्मक नजीर साबित होगा।
अंतिम रूप से, यह स्पष्ट है कि बच्चे का भविष्य किसी भी विवादास्पद माहौल से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। इस केस ने दिखाया है कि कानून का उद्देश्य केवल अलगाव को औपचारिक रूप देना नहीं, बल्कि बिखरे हुए परिवार के बीच बच्चे के लिए एक सुरक्षित आश्रय सुनिश्चित करना भी है। अब यह बच्चा अपने माता-पिता की कानूनी खींचतान से दूर, एक शांत और सुरक्षित भविष्य की उम्मीद के साथ आगे बढ़ रहा है।