राजस्थान

प्राचीन जल स्रोतों का संरक्षण और पुनर्जीवन पर विशेष जोर

प्राचीन जल स्रोतों का संरक्षण और पुनर्जीवन अभियान शुरू हुआ। ऐतिहासिक बावड़ियों और कुओं को संवारकर जल संरक्षण व पर्यटन को बढ़ावा दिया जाएगा।

By अजय त्यागी 1 min read
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रामद्वारा बावड़ी का निरीक्षण

भीलवाड़ा (पंकज पोरवाल)। प्राचीन जल स्रोतों का संरक्षण और पुनर्जीवन आज के दौर की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है, जिसे लेकर एक व्यापक जन अभियान की शुरुआत की गई है। शहर की प्राचीन बावड़ियों, कुओं और जलाशयों की दयनीय स्थिति को देखते हुए इन्हें पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया गया है। ये प्राचीन जल स्रोत न केवल हमारी अमूल्य सांस्कृतिक विरासत हैं, बल्कि भविष्य के लिए जल सुरक्षा का एक सशक्त माध्यम भी हैं। इनके संरक्षण से न केवल भू-जल स्तर में सुधार होगा, बल्कि शहर की सुंदरता भी बढ़ेगी।

विधायक अशोक कुमार कोठारी ने शहर के विभिन्न हिस्सों का दौरा कर इन विरासतों की स्थिति का जायजा लिया। इस दौरान गुलमंडी स्थित शिव मंदिर की बावड़ी, बालाजी मार्केट की बावड़ी, सीतारामजी की बावड़ी और माणिक्य नगर की रामद्वारा बावड़ी का निरीक्षण किया गया। इसके अतिरिक्त सांगानेर, पंचमुखी दरबार, तेजाजी चौक और शास्त्री नगर की बासा की बगीची तक फैले इन जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के लिए स्पष्ट निर्देश जारी किए गए हैं।

सांस्कृतिक विरासत का महत्व

प्राचीन बावड़ियां और कुएं हमारे पूर्वजों की जल प्रबंधन कला का बेहतरीन उदाहरण हैं, जिन्हें अनदेखी के कारण नष्ट होने से बचाना अनिवार्य है। विधायक ने कहा कि प्राचीन जल स्रोतों का संरक्षण और पुनर्जीवन को केवल सफाई तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि इनका सौंदर्यीकरण भी किया जाएगा। इन स्थानों को धार्मिक और पर्यटन महत्व से जोड़ने की योजना है, जिससे लोग अपनी इन ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति जागरूक हो सकें और इनके रखरखाव में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।

अधिकारियों के साथ हुए निरीक्षण में साफ-सफाई, दीवार मरम्मत और जल आवक के रास्तों को साफ करने पर विशेष चर्चा हुई। नगर निगम आयुक्त हेमाराम चौधरी और जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के सहायक अभियंताओं को इन कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर पूर्ण करने के निर्देश दिए गए हैं। जन सहभागिता के बिना किसी भी अभियान की पूर्ण सफलता कठिन है, इसलिए इस कार्य में स्थानीय निवासियों का जुड़ाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

पर्यटन और जल सुरक्षा

जल स्रोतों का जीर्णोद्धार भविष्य में शहर के लिए एक बड़ी उपलब्धि साबित होगा। जब ये स्थल साफ-सुथरे और सुंदर होंगे, तो ये निश्चित रूप से लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेंगे। प्राचीन जल स्रोतों का संरक्षण और पुनर्जीवन का यह अभियान आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुखद संदेश है कि हम अपनी धरोहरों के प्रति सजग हैं। जल संरक्षण के साथ ही इन स्थानों का पर्यटन के रूप में विकास होने से स्थानीय संस्कृति को वैश्विक पहचान भी मिल सकेगी।

इस अभियान में एडवोकेट अर्पित कोठारी, संजय राठी और केदार जागेटिया सहित अन्य समाजसेवियों की सक्रिय उपस्थिति यह दर्शाती है कि समाज इस दिशा में गंभीर है। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों का यह समन्वय एक बेहतर भविष्य की आधारशिला रखता है। यदि समय रहते इन ऐतिहासिक संरचनाओं को संवार लिया गया, तो हम अपनी प्यासी धरती को भविष्य में जल का सुरक्षित उपहार दे पाएंगे। यह पहल आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

निरंतर निगरानी की आवश्यकता

अंततः, यह अभियान तब तक सफल माना जाएगा जब तक इन जल स्रोतों की निरंतर देखरेख सुनिश्चित न हो। प्राचीन जल स्रोतों का संरक्षण और पुनर्जीवन केवल एक बार की सफाई का कार्य नहीं है, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है जिसे हर नागरिक को अपनाना होगा। उम्मीद है कि आगामी समय में ये ऐतिहासिक धरोहरें पुनः अपनी चमक बिखेरेंगी और शहर को जल संकट से मुक्ति दिलाने में अपना योगदान देंगी।

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