भीषण लू का कहर लगातार जारी है। एनजीटी ने केंद्र और कई राज्यों को नोटिस जारी कर इस स्वास्थ्य संकट पर एक्शन प्लान पेश करने को कहा है।
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
(दिल्ली)। भीषण लू का कहर इस समय पूरे देश में एक गंभीर पर्यावरणीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में उभर चुका है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने देश भर में बढ़ती लू की स्थितियों का स्वत: संज्ञान लेते हुए इसे अत्यंत चिंताजनक माना है। ट्रिब्यूनल ने केंद्र सरकार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, पंजाब, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड तथा छत्तीसगढ़ सहित कई राज्य सरकारों से इस मामले में जवाब तलब किया है।[1]
एनजीटी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि बढ़ता तापमान केवल मौसम की मार नहीं, बल्कि एक बड़ा पर्यावरणीय संकट है। ट्रिब्यूनल ने इन सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे लू से निपटने के लिए अपने ठोस एक्शन प्लान तैयार करें और शपथ पत्र के माध्यम से अदालत में पेश करें। इस मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त 2026 को निर्धारित की गई है, जिस पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं।
ट्रिब्यूनल का यह कदम बढ़ती गर्मी से होने वाली मौतों और स्वास्थ्य समस्याओं को देखते हुए उठाया गया है। एनजीटी ने राज्य सरकारों की तैयारियों और उनके द्वारा उठाए जा रहे कदमों को अपर्याप्त मानते हुए कड़ा रुख अपनाया है। ट्रिब्यूनल का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में लू की स्थिति और भी भयावह हो सकती है।
इस मामले पर एनजीटी ने अपने निर्देश में कहा:
"भीषण लू एक गंभीर पर्यावरणीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है। सभी संबंधित प्राधिकरणों को लू से निपटने के लिए अपना कार्ययोजना रिपोर्ट और हलफनामा 19 अगस्त तक जमा करना अनिवार्य है।"
एनजीटी के निर्देश के बाद अब राज्य सरकारों को युद्धस्तर पर लू प्रबंधन योजनाएं बनानी होंगी। इसमें शहरी क्षेत्रों में लू से बचाव के लिए 'कूलिंग सेंटर' स्थापित करना, सार्वजनिक स्थानों पर पानी की व्यवस्था करना और स्वास्थ्य सेवाओं को अलर्ट मोड पर रखना शामिल है। इसके अलावा, पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए वृक्षारोपण और जल निकायों के संरक्षण पर भी जोर दिया जाएगा।
देश भर में भीषण लू का कहर जिस तरह बढ़ रहा है, उसने प्रशासनिक मशीनरी को सक्रिय होने पर मजबूर कर दिया है। राज्यों को अब यह बताना होगा कि वे नागरिकों को लू के प्रभावों से बचाने के लिए किस तरह का बुनियादी ढांचा विकसित कर रहे हैं। भीषण लू का कहर और बढ़ते तापमान के बीच यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि गरीब और मजदूर वर्ग को भी उचित राहत और सुविधाएं मिल सकें।
19 अगस्त 2026 को होने वाली सुनवाई काफी महत्वपूर्ण होगी क्योंकि इसमें विभिन्न राज्यों द्वारा जमा किए गए शपथ पत्रों का विश्लेषण किया जाएगा। एनजीटी की यह सख्ती भविष्य में सरकारी नीतियों में बड़े बदलाव ला सकती है। प्रशासनिक स्तर पर भी अब जवाबदेही तय करने का दौर शुरू हो गया है ताकि नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ न हो सके।
अंततः, सरकारी प्रयास तभी सफल होंगे जब जनता भी अपनी जिम्मेदारी समझेगी और अत्यधिक गर्मी में आवश्यक सावधानी बरतेगी। सरकार और न्यायपालिका की यह जुगलबंदी बढ़ते तापमान से निपटने में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है। भीषण लू का कहर कम करने के लिए अब साझा प्रयासों की आवश्यकता है ताकि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित पर्यावरण मिल सके। (एजेंसी इनपुट के साथ)
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