दिल्ली

स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर में भीषण आग से मची अफरा-तफरी

देश की राजधानी में स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर में भीषण आग ने शैक्षणिक परिसरों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

By अजय त्यागी 1 min read
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स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर में भीषण आग

(नई दिल्ली, दिल्ली)। स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर में भीषण आग ने एक बार फिर राजधानी की लचर अग्नि सुरक्षा व्यवस्था की कलई खोलकर रख दी है। संस्थान की इमारत की दूसरी मंजिल पर लगी आग ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर सुरक्षित माने जाने वाले शिक्षण संस्थानों में आग बुझाने के पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं हैं। जब सुबह नौ बजकर 37 मिनट पर फायर सर्विस को सूचना मिली, तो आठ दमकल गाड़ियां मौके पर पहुँच गईं, लेकिन तब तक आग अपनी भयावह तस्वीर दिखा चुकी थी।[1]

सुरक्षा के नाम पर कागजों में दर्ज दावे अक्सर धरातल पर दम तोड़ते नजर आते हैं। यह हादसा महज एक घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की उस सुस्ती का परिणाम है, जो हमेशा किसी बड़े नुकसान के बाद ही जागती है। स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर में भीषण आग इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कैसे प्रशासनिक लापरवाही सरकारी संपत्ति को दांव पर लगाती है। दमकलकर्मियों का संघर्ष जारी है, लेकिन सवाल यह है कि ऐसी नौबत आती ही क्यों है।

सुरक्षा दावों का सच

स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर में भीषण आग के दौरान जो स्थिति बनी, वह किसी भी बड़े संस्थान के लिए शर्मनाक है। राजधानी के हृदय स्थल में स्थित यह इमारत अपने आप में एक मिसाल मानी जाती है, लेकिन सुरक्षा मानकों के मामले में यह फिसड्डी साबित हुई है। आग की लपटें जब दूसरी मंजिल से बाहर आने लगीं, तब जाकर प्रशासन की नींद टूटी। क्या इतने बड़े संस्थान में आग से निपटने के लिए कोई प्रभावी चेतावनी प्रणाली काम नहीं कर रही थी?

स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर में भीषण आग की जांच जब होगी, तो शायद फाइलों में सब कुछ ठीक पाया जाएगा। लेकिन सच्चाई यह है कि आग लगने के बाद सक्रिय होने वाली मशीनरी की तुलना में यदि पहले से बचाव के इंतजाम पुख्ता होते, तो आज यह नौबत नहीं आती। राजधानी की इमारतें बार-बार आग की चपेट में आ रही हैं, पर सुधार के नाम पर केवल रस्म अदायगी की जाती है।

दमकल का कठिन संघर्ष

स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर में भीषण आग के बाद मौके पर पहुंची दमकल विभाग की आठ गाड़ियों ने घंटों कड़ी मशक्कत की। भीड़भाड़ वाले इलाके में इस तरह की घटना का होना किसी बड़ी आपदा को निमंत्रण देने जैसा है। दमकलकर्मियों का साहस तो काबिले तारीफ है, पर संसाधनों की कमी और सुरक्षा मानकों की अनदेखी के बीच उनका यह काम और भी कठिन हो जाता है।

आग पर काबू पाने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन नुकसान की भरपाई कौन करेगा? स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर में भीषण आग ने साबित कर दिया है कि संस्थानों के भीतर सुरक्षा के नाम पर केवल खानापूर्ति हो रही है। जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी और अधिकारियों की जवाबदेही निश्चित नहीं की जाएगी, तब तक ऐसी घटनाएं हमारी व्यवस्था का हिस्सा बनी रहेंगी। शहर की सुरक्षा अब केवल भाग्य के भरोसे छोड़ दी गई है।

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