राजमार्ग विस्तार के लिए अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत प्रशासन ने 4,000 वर्ग मीटर जमीन को कब्जामुक्त कराकर विकास की राह प्रशस्त की है।
राजमार्ग विस्तार के लिए अतिक्रमण हटाओ अभियान
अहमदाबाद, गुजरात। राजमार्ग विस्तार के लिए अतिक्रमण हटाओ अभियान अब प्रदेश भर में एक नई बहस और विकास की गति का पैमाना बन गया है। विरामगाम में जब बुलडोजर चले, तो न केवल कंक्रीट के ढांचे ढहे, बल्कि उस संकीर्ण मानसिकता पर भी चोट हुई जो वर्षों से सार्वजनिक रास्तों को अपने स्वार्थ की भेंट चढ़ाए हुए थी। तीन दरगाहों समेत दर्जनों स्थायी-अस्थायी कब्जों को हटाना यह साबित करता है कि यदि सरकार में इच्छाशक्ति हो, तो 'अतिक्रमण' की जड़ें कितनी भी गहरी क्यों न हों, उन्हें उखाड़ फेंका जा सकता है।
विकास के नाम पर जमीन खाली कराने की यह प्रक्रिया महज एक प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए सबक है जो हाईवे की जमीन को अपनी जागीर समझते हैं। 550 से अधिक पुलिसकर्मियों की भारी तैनाती इस बात का संकेत है कि प्रशासन इस बार किसी भी प्रकार की 'भीड़तंत्र' या विरोध को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं था। शांतिपूर्ण तरीके से अभियान का संपन्न होना यह दर्शाता है कि जब प्रशासन का रुख सख्त होता है, तो विवादों के सुर स्वतः ही धीमे पड़ जाते हैं।[1]
राजमार्ग विस्तार के लिए अतिक्रमण हटाओ अभियान का मूल उद्देश्य विरामगाम में नेशनल हाईवे-17 को चार लेन का बनाना है। बरसों से संकरा रास्ता यात्रियों के लिए मौत का जाल बना हुआ था, जहाँ छोटी सी चूक बड़ी दुर्घटना को न्यौता देती थी। प्रशासन के अनुसार, जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और मालिकों को उचित मुआवजा भी दिया गया है। सवाल यह है कि आखिर विकास कार्यों में देरी क्यों होती है? क्यों प्रशासन को हर बार भारी पुलिस बल लगाकर ही अपनी बात मनवानी पड़ती है?
हाईवे का चौड़ीकरण यात्रा को सुगम तो बनाएगा, लेकिन उन व्यापारियों का क्या जो इस प्रक्रिया में अपनी दुकानें गंवा बैठे हैं? प्रशासन भले ही मुआवजे और वैकल्पिक व्यवस्था का दावा करे, लेकिन हकीकत में छोटी दुकानों के मालिकों का जीवन चक्र एक झटके में तबाह हो जाता है। विकास की इस दौड़ में अक्सर आम आदमी की छोटी-छोटी खुशियां कुचल दी जाती हैं, जिनकी भरपाई केवल कागजी मुआवजे से नहीं हो सकती।
राजमार्ग विस्तार के लिए अतिक्रमण हटाओ अभियान की सफलता के पीछे सामुदायिक प्रतिनिधियों की भूमिका अहम रही। यदि समय रहते ये बैठकें न हुई होतीं, तो शायद विरामगाम की सड़कें आज किसी और ही बवाल का केंद्र होतीं। यह प्रशासनिक परिपक्वता का उदाहरण है, लेकिन यह भी सच है कि बिना सख्त कार्रवाई के अतिक्रमणकारियों को सबक नहीं सिखाया जा सकता। अब समय आ गया है कि प्रदेश में ऐसी जगहों को चिन्हित कर पहले ही कार्रवाई की जाए, ताकि किसी भी परियोजना के दौरान बवाल की नौबत ही न आए।
"इस अभियान के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक डीवाईएसपी, 15 पुलिस इंस्पेक्टर और 550 से अधिक पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था। प्रशासन को सभी पक्षों का पूरा सहयोग मिला, जिसके बाद प्रक्रिया शांतिपूर्ण तरीके से शुरू हुई।"
अतिक्रमण हटने के बाद निर्माण कार्य की गति ही तय करेगी कि यह अभियान वास्तव में विकास का पर्याय बना या केवल एक और सरकारी दिखावा। यदि कल को फिर से उसी स्थान पर नए अतिक्रमण पनपने लगे, तो सारा किया-धरा पानी में चला जाएगा। उम्मीद है कि प्रशासन इस बार निर्माण कार्य की गति में वही सख्ती दिखाएगा जो उसने अतिक्रमण हटाने में दिखाई है। विकास की राह पर चलने के लिए केवल रास्ते चौड़े करना पर्याप्त नहीं, उन पर अनुशासन बनाए रखना भी अनिवार्य है।