स्वास्थ्य

गया की औषधीय पहाड़ी: विकास के दावों के बीच दम तोड़ती विरासत

गया की औषधीय पहाड़ी दुर्लभ वनस्पतियों का केंद्र है। आधुनिक स्वास्थ्य समस्याओं के बीच यह क्षेत्र सरकारी उपेक्षा के चलते विलुप्त होने की कगार पर है।

By अजय त्यागी 1 min read
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गया की औषधीय पहाड़ी

गया, बिहार। गया जिले के इमामगंज ब्लॉक की बिरज पंचायत में स्थित 'बांका पहाड़ी' इन दिनों चर्चा में है। स्थानीय लोग इसे 'औषधीय पहाड़ी' (Medicine Hill) कहते हैं, जहाँ की गुफाओं और ढलानों में छिपे हैं जटिल बीमारियों के प्राकृतिक उपचार।

गया की औषधीय पहाड़ी पर मौजूद जड़ी-बूटियाँ आज भी कई असाध्य रोगों का काल मानी जाती हैं। वन विभाग समिति के अध्यक्ष विजय कुमार अग्रवाल का दावा है कि यहाँ की वनस्पतियों का उपयोग ग्रामीण सदियों से करते आए हैं।

अब आयुष मंत्रालय की टीम ने भी यहाँ का दौरा कर नमूने एकत्र किए हैं, जिससे उम्मीद जगी है कि शायद अब इस प्राकृतिक खजाने को पहचान मिलेगी। हालांकि, धरातल पर अभी भी कई चुनौतियां बरकरार हैं जो इस क्षेत्र के विकास को रोक रही हैं।[1]

हडजोड़ का चमत्कारिक असर

गया की औषधीय पहाड़ी पर 'हडजोड़' (Cissus quadrangularis) नामक दुर्लभ बेल प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। इसे स्थानीय लोग 'बौला' कहते हैं, जो टूटी हड्डियों को जोड़ने के लिए किसी 'प्लास्टर ऑफ पेरिस' से कम नहीं है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स ऊतकों की मरम्मत तेजी से करते हैं। केंद्रीय दक्षिण बिहार विश्वविद्यालय के हेमंत कुमार बताते हैं कि इसका उपयोग ऑस्टियोपोरोसिस और जोड़ों के दर्द में भी प्रभावी है। लखन भारती जैसे कई ग्रामीणों ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया है कि अस्पताल के चक्कर काटने के बाद इसी पहाड़ी की जड़ी-बूटियों ने उन्हें दोबारा चलने-फिरने लायक बनाया।

कलमेघ और अन्य वनस्पतियां

यहाँ पाए जाने वाले 'कलमेघ' को 'ग्रीन चिरायता' भी कहा जाता है, जो लिवर के लिए एक अचूक टॉनिक है। निजामिया यूनानी मेडिकल कॉलेज के डॉ. मोहम्मद शमशाद आलम का कहना है कि यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में अत्यंत सहायक है।

"हडजोड़ का उपयोग पाउडर, काढ़े, मलहम और विभिन्न हर्बल सप्लीमेंट्स के रूप में किया जाता है। हालांकि, इसे चिकित्सीय देखरेख में ही उपयोग करना चाहिए।" - हेमंत कुमार, उद्यानिकी विभाग।

पहाड़ी पर मिलने वाले 'गुडमार' और 'इंद्रजौ' (Titki Jau) भी पेट संबंधी विकारों और मधुमेह जैसी बीमारियों के लिए रामबाण हैं। कुंती देवी जैसी स्थानीय महिलाएं आज भी अपने स्वास्थ्य के लिए अस्पतालों पर निर्भर रहने के बजाय इसी पहाड़ी की जड़ी-बूटियों पर भरोसा करती हैं।

राजनीतिक दावों की हकीकत

गया की औषधीय पहाड़ी का विकास अब एक सियासी मुद्दा बन चुका है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने इसे 'मेडिसिन नर्सरी' बनाने की वकालत की है, तो वहीं स्थानीय विधायक दीपा मांझी ने भी विधानसभा में यह मुद्दा उठाया है।

लेकिन, जमीनी हकीकत इन वादों से कोसों दूर है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि वन विभाग की घोर लापरवाही के कारण अवैध कटाई बढ़ी है। बांका पहाड़ी की गोद में बसे इस खजाने को पर्यटन केंद्र बनाने की फाइलें आज भी सरकारी दफ्तरों में धूल फांक रही हैं।

भविष्य की चुनौतियां

आयुष मंत्रालय की टीम ने स्वीकार किया है कि गया की औषधीय पहाड़ी पर कई दुर्लभ औषधीय पौधे मौजूद हैं। आगामी दौरों में इसका विस्तृत अध्ययन किया जाएगा। लेकिन क्या यह अध्ययन केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगा?

यदि इस प्राकृतिक खजाने पर शीघ्र शोध नहीं हुआ और इसे संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां केवल इन पौधों के नाम ही सुन पाएंगी। बांका पहाड़ी के प्रति बरती जा रही यह उदासीनता न केवल कुदरत के साथ खिलवाड़ है, बल्कि भविष्य के साथ भी एक बड़ा मज़ाक है।

अस्वीकरण: 

यह रिपोर्ट विभिन्न विश्वस्त समाचार स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसे केवल सूचनात्मक उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। किसी भी जड़ी-बूटी का सेवन करने से पहले आयुर्वेदिक या यूनानी विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक जिम्मेदार नहीं हैं।

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