आर्थिक धोखाधड़ी में ईडी ने बड़ी कार्रवाई करते हुए तीसरे आरोपी विक्रम वाधवा को गिरफ्तार किया। 645 करोड़ की हेराफेरी का खुलासा हुआ।
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
नई दिल्ली, भारत। आर्थिक धोखाधड़ी की आंच अब उन रसूखदारों तक पहुँच गई है जो सरकारी खजाने को निजी तिजोरी समझते थे। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 645 करोड़ रुपये के इस बड़े गबन मामले में रियल एस्टेट व्यवसायी विक्रम वाधवा को गिरफ्तार कर लिया है। यह गिरफ्तारी महज एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि उस तंत्र पर प्रहार है जो सत्ता और रसूख के गलियारों में बैठकर आम जनता के टैक्स के पैसे को शैल कंपनियों के जरिए ठिकाने लगा रहा था। [1]
ईडी के अनुसार, यह मामला हरियाणा सरकार और चंडीगढ़ प्रशासन के खातों से जुड़ी धांधली का है। 70 करोड़ रुपये से अधिक की अपराध से अर्जित राशि (Proceeds of Crime) का वाधवा के निजी खाते में सीधे तौर पर मिलना यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी और व्यवस्थित हैं। सरकारी सिस्टम में बैठे 'रखवालों' की मिलीभगत के बिना इतना बड़ा खेल मुमकिन नहीं था, जो इसे केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि शासन प्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान बनाता है।
आर्थिक धोखाधड़ी को अंजाम देने के लिए एक सुनियोजित जाल बुना गया था, जिसमें कैपको फिनटेक सर्विसेज, स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट्स और आर एस ट्रेडर्स जैसी शैल कंपनियां माध्यम बनीं। ईडी का दावा है कि इन फर्जी कंपनियों के जरिए सरकारी धन को निकाला गया और बाद में उसे जटिल बैंकिंग ट्रांजेक्शन के जरिए लेयरिंग कर छिपाया गया। यह तकनीक बताती है कि कैसे अपराधी किस्म के व्यवसायी और सरकारी सिस्टम के कुछ भ्रष्ट चेहरे हाथ मिलाकर जनता के भरोसे का कत्ल करते हैं।
"विक्रम वाधवा ने अपराध से अर्जित राशि के सृजन, लेयरिंग और उसे छिपाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।" - प्रवर्तन निदेशालय (ED), आधिकारिक बयान।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन गबन किए गए रुपयों का बड़ा हिस्सा ज्वैलर्स के माध्यम से नकदी में तब्दील किया गया। यह पैसा बाद में सरकारी अधिकारियों और व्यवसायियों के बीच बांटा गया। यह सब एक ऐसी पटकथा की तरह है जो हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हमारा सरकारी तंत्र इतना असुरक्षित कैसे हो गया कि खजाने की चाबियां गलत हाथों में पहुँच गईं?
आर्थिक धोखाधड़ी की जांच में रिभव ऋषि और अभय कुमार की पहले ही गिरफ्तारी हो चुकी है, जो यह संकेत देती है कि इस पूरे खेल में कई बड़े चेहरे अभी भी जांच के दायरे से बाहर हैं। विक्रम वाधवा का चार दिन की ईडी कस्टडी में जाना उन लोगों की नींद उड़ाने के लिए काफी है, जिन्होंने इस गबन में किसी न किसी तरह की हिस्सेदारी निभाई है।
यह मामला केवल 645 करोड़ की हेराफेरी का नहीं है, बल्कि व्यवस्था में व्याप्त उस कैंसर का है जो विकास के फंड को दीमक की तरह खा रहा है। क्या यह गिरफ्तारी केवल एक खानापूर्ति है या फिर ईडी वास्तव में इस गंदा खेल के अंतिम लाभार्थी तक पहुँच पाएगी? यह देखना दिलचस्प होगा, क्योंकि इस तरह के घोटालों में अक्सर छोटे मोहरे बलि चढ़ा दिए जाते हैं और असली सूत्रधार पर्दे के पीछे सुरक्षित रहते हैं।