मिशन कर्मयोगी और उन्नति के जरिए सरकारी प्रशिक्षण संस्थानों का कायाकल्प हो रहा है। 700 से अधिक संस्थानों को अब एक पोर्टल से जोड़ा जा रहा है।
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
नई दिल्ली। मिशन कर्मयोगी और उन्नति के माध्यम से देश भर के सरकारी प्रशिक्षण संस्थानों का एक ऐसा ढांचागत बदलाव शुरू किया गया है, जो दशकों से जमी हुई नौकरशाही की धूल झाड़ने का दावा करता है। कैपेसिटी बिल्डिंग कमीशन (CBC) की अध्यक्ष एस. राधा चौहान के अनुसार, अब देश भर के 700 से अधिक प्रशिक्षण संस्थानों को एक साझा 'उन्नति' पोर्टल के जरिए जोड़ा जा रहा है। यह पहल उन सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली को सुदृढ़ करने के लिए है, जो अब तक अपनी-अपनी ढफली और अपना-अपना राग अलाप रहे थे।[1]
हकीकत यह है कि दशकों से हमारे सरकारी कर्मचारी बिना किसी व्यवस्थित प्रशिक्षण के सेवा में आते हैं और बिना किसी कौशल उन्नयन के सेवानिवृत्त भी हो जाते हैं। एस. राधा चौहान का यह स्वीकार करना कि कुछ राज्यों में तो मात्र तीन प्रतिशत कर्मचारी ही संस्थागत प्रशिक्षण प्राप्त कर पाते हैं, उस व्यवस्था की पोल खोलता है जो खुद को 'डिजिटल इंडिया' और 'आधुनिक' होने का दावा करती है। क्या यह नया पोर्टल इन संस्थानों को केवल कागजों पर जोड़ेगा या वास्तव में कार्यसंस्कृति में कोई बदलाव लाएगा, यह एक बड़ा प्रश्न है।
मिशन कर्मयोगी और उन्नति का मुख्य उद्देश्य संस्थानों के बीच संसाधनों, विशेषज्ञता और ज्ञान का आदान-प्रदान करना है। अब तक स्थिति यह थी कि एक संस्थान के पास फैकल्टी है तो दूसरे के पास बुनियादी ढांचा, लेकिन तालमेल के अभाव में सब कुछ व्यर्थ पड़ा था। अब 'उन्नति' के जरिए इन बिखरे हुए संस्थानों को एक नेटवर्क में पिरोने की कोशिश की जा रही है, ताकि सीमित सरकारी संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित हो सके।
"हम यह भी नहीं जानते थे कि देश भर में 700 से अधिक प्रशिक्षण संस्थान हैं। वे सभी प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करते हैं, लेकिन काफी हद तक स्वतंत्र रूप से काम करते हैं।" - एस. राधा चौहान, अध्यक्ष, कैपेसिटी बिल्डिंग कमीशन (CBC)।
यह साझा मंच उन संस्थानों के लिए एक लाइफलाइन हो सकता है जो सालों से संसाधनों की कमी के चलते केवल नाममात्र के अस्तित्व में थे। लेकिन सवाल यह है कि क्या संस्थानों के जुड़ने से उन कर्मचारियों की मानसिकता में बदलाव आएगा जो वर्षों से लालफीताशाही के आदी हो चुके हैं? केवल तकनीक और पोर्टल से बदलाव नहीं आते, जब तक कि प्रशिक्षण के प्रति उच्च अधिकारियों की नीयत साफ न हो।
मिशन कर्मयोगी और उन्नति केवल पोर्टल्स तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तहत संस्थानों के मानकीकरण (Standardisation) और उनके प्रदर्शन के आकलन पर भी जोर दिया जा रहा है। अब तक 210 से अधिक संस्थानों को नेशनल स्टैंडर्ड्स फॉर सिविल सर्विसेज ट्रेनिंग इंस्टीट्यूशंस (NSCSTI) के तहत मान्यता दी जा चुकी है। यह कोशिश तो अच्छी है, लेकिन नौकरशाही में प्रशिक्षण की गुणवत्ता का पैमाना केवल प्रमाण पत्र नहीं, बल्कि सेवा वितरण (Service Delivery) में आने वाला सुधार होना चाहिए।
सरकार का यह मिशन कर्मयोगी, जिसकी नींव 2020 में रखी गई थी, का लक्ष्य एक भविष्य के लिए तैयार नागरिक सेवा बनाना है। यह एक सराहनीय लक्ष्य है, बशर्ते कि इसे केवल एक और प्रशासनिक अभ्यास बनाकर न छोड़ दिया जाए। जब तक सरकारी कर्मचारी खुद को 'जनसेवक' के रूप में नहीं देखेंगे और प्रशिक्षण संस्थानों का उपयोग अपनी 'क्षमताओं' को निखारने के लिए नहीं करेंगे, तब तक यह सारा ढांचागत बदलाव केवल एक और पोर्टल बनकर रह जाएगा।