गुरु ग्रंथ साहिब पांडुलिपि का बड़ा खुलासा। ज्ञान भारतम सर्वे में मिले 350 साल पुराने दुर्लभ ग्रंथ, संरक्षण के अभाव में मिट रहा इतिहास।
गुरु ग्रंथ साहिब पांडुलिपि
औरंगाबाद, बिहार। गुरु ग्रंथ साहिब पांडुलिपि का मिलना भारतीय ज्ञान परंपरा के लिए एक ऐतिहासिक घटना है, लेकिन साथ ही यह सरकारी उदासीनता का बड़ा सबूत भी है। केंद्र सरकार के 'ज्ञान भारतम' सर्वेक्षण के दौरान बिहार के औरंगाबाद जिले के दाउदनगर स्थित एक सदियों पुराने गुरुद्वारे में सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर द्वारा हस्तलिखित 'गुरु ग्रंथ साहिब पांडुलिपि' की खोज हुई है। 350 वर्ष से अधिक पुरानी यह पांडुलिपि आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। इसके पन्ने इतने नाजुक हो चुके हैं कि जरा सी लापरवाही इन्हें हमेशा के लिए मिटा सकती है।[1]
ईटीवी भारत की रिपोर्ट के अनुसार, औरंगाबाद के जिला कला एवं संस्कृति अधिकारी (DACO) कुमार पप्पू राज ने स्वीकार किया है कि यह पांडुलिपि बेहद जर्जर अवस्था में है। हस्तनिर्मित कागज पर लिखे इसके लगभग 1400 पन्ने आज संरक्षण के अभाव में नष्ट हो रहे हैं। यदि समय रहते सरकारी मशीनरी नहीं जागी, तो आने वाली पीढ़ियां इस महान धरोहर को केवल तस्वीरों में ही देख पाएंगी। यह केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि गुरु तेग बहादुर द्वारा धार्मिक स्वतंत्रता के लिए लड़ी गई उस महान लड़ाई का जीवंत दस्तावेज है, जिसने मुगलिया अत्याचारों के आगे सिर नहीं झुकाया था।
गुरु ग्रंथ साहिब पांडुलिपि के संरक्षण में सबसे बड़ी बाधा कानूनी पेचीदगियां और जमीन का मालिकाना हक है। दाउदनगर गुरुद्वारा प्रबंधन समिति के अध्यक्ष राजेंद्र सर्राफ का कहना है कि यह स्थान 17वीं सदी में बाबा बालाजी दास द्वारा स्थापित किया गया था। आज भी स्थानीय स्वर्णकार समाज इस स्थान की देखरेख कर रहा है, लेकिन जमीन के कागजात न होने के कारण सिख समुदाय वहां भव्य गुरुद्वारा बनाने में असमर्थ है। क्या विकास की फाइलों में उलझकर हम अपनी संस्कृति को खत्म होते देखेंगे?
"यह गुरुद्वारा 350 साल से अधिक पुराना है। यह पांडुलिपि एक रत्न है जिसे हम हर हाल में संजोना चाहते हैं, लेकिन जमीन के मालिकाना हक का कानूनी विवाद विकास में बड़ी बाधा बना हुआ है।" - राजेंद्र सर्राफ, अध्यक्ष, दाउदनगर गुरुद्वारा प्रबंधन समिति।
नवादा जिले की राजाउली संगत और कटिहार के गुरुद्वारे में भी ऐसी ही दुर्लभ पांडुलिपियां मिली हैं। कटिहार की पांडुलिपि तो और भी अद्भुत है, जिसके अंतिम पृष्ठ पर धातु की स्याही बनाने का फार्मूला लिखा है। इसे नीम, विजयसार, सोना और तांबे जैसी सामग्रियों से 21 दिनों में तैयार किया गया था। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि बाढ़ के पानी में छह महीने डूबे रहने के बाद भी इसके पन्ने सुरक्षित रहे। यह उस प्राचीन विज्ञान और तकनीक का प्रमाण है, जिसे आधुनिक युग का 'स्मार्ट इंडिया' भूल चुका है।
गुरु ग्रंथ साहिब पांडुलिपि के सामने आने के बाद अब यह जिम्मेदारी जिला प्रशासन पर है कि वह इसे केवल सर्वे ऐप पर 'जियो-टैग' करके ही अपनी औपचारिकता पूरी न कर ले। कटिहार स्थित गुरुद्वारे में गुरु गोबिंद सिंह का फारसी में हस्ताक्षर किया हुआ हुकुमनामा और उनके सैनिक मंगल सिंह द्वारा लिखा गया वह विवरण भी मौजूद है, जिसमें गुरु साहिब की हत्या के समय की घटनाओं का वर्णन है। यह सब साक्ष्य एक बहुत बड़ा इतिहास संजोए हुए हैं।
"इस पांडुलिपि का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। यह न केवल धार्मिक महत्व की वस्तु है, बल्कि हमारे देश की महान ज्ञान परंपरा का प्रतीक है जिसे भावी पीढ़ियों के लिए बचाना हमारा कर्तव्य है।" - प्रतिभा कुमारी, जिला कला एवं संस्कृति अधिकारी, नवादा।
बिहार पर्यटन विभाग ने गुरुद्वारे के विकास पर करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा तो किया है, लेकिन आज भी वहां पहुंचना एक बड़ी चुनौती है। क्या हमारी राजनीति केवल वोट बैंक के आधार पर तीर्थस्थलों को देखती है? अगर यह स्थल अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के लिए एक प्रमुख गंतव्य बन सकता है, तो रेल कनेक्टिविटी और संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने में सरकारी तंत्र इतना सुस्त क्यों है?
गुरु ग्रंथ साहिब पांडुलिपि की खोज ने उन दावों को खोखला साबित कर दिया है जिनमें सरकार अपनी 'सांस्कृतिक विरासत' को सहेजने का दम भरती है। ज्ञान भारतम सर्वेक्षण का उद्देश्य तो महान था, लेकिन क्या इसका अंजाम केवल फाइलों में बंद होकर रह जाएगा? औरंगाबाद, नवादा और कटिहार में मिली ये पांडुलिपियां एक कड़वी सच्चाई बयां कर रही हैं कि हमारे पास इतिहास तो है, लेकिन उसे सहेजने का न तो जज्बा है और न ही दूरदर्शिता।
यदि इन पांडुलिपियों के लिए तत्काल प्रभाव से अंतरराष्ट्रीय स्तर के संरक्षण विशेषज्ञों की टीम नहीं बुलाई गई, तो वे दिन दूर नहीं जब हम गर्व से कहेंगे कि 'हमारे पास गौरवशाली इतिहास था', जो हमने अपनी आंखों के सामने नष्ट होते देखा। क्या हम अगली बार फिर किसी नए सर्वे की घोषणा का इंतजार करेंगे, या इस बार सच में कुछ ठोस होगा? यह सवाल केवल सरकार से नहीं, बल्कि उन लोगों से भी है जो अपनी संस्कृति पर गर्व का ढोंग करते हैं।