वंदे मातरम अनिवार्य करने के सरकारी आदेश पर बवाल। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने फैसले को असंवैधानिक बताते हुए विरोध जताया।
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
कोलकाता, पश्चिम बंगाल। वंदे मातरम अनिवार्य करने के राज्य सरकार के ताजा फरमान ने शिक्षा जगत से लेकर सियासी गलियारों तक एक नई और तीखी बहस को जन्म दे दिया है। राज्य के सभी सरकारी स्कूलों और सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त मदरसों में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान वंदे मातरम के सभी छंदों का गायन अनिवार्य किए जाने के फैसले के बाद से भारी खलबली मची हुई है। इस आदेश के सामने आते ही ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने मोर्चा खोल दिया है और इस निर्णय पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे तत्काल वापस लेने की मांग की है।
बोर्ड का सीधा कहना है कि यह आदेश न केवल छात्रों की धार्मिक भावनाओं को आहत करता है, बल्कि देश के संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का भी स्पष्ट उल्लंघन है। इस फरमान के बाद से ही विवादों का बाजार गर्म हो गया है और सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकार एक विशेष नियम को सभी पर थोपकर विवाद को न्योता दे रही है। बोर्ड ने स्पष्ट कहा है कि यह मुद्दा व्यक्तिगत अंतरात्मा, धार्मिक स्वतंत्रता और निजी पसंद का है।[1]
वंदे मातरम अनिवार्य करने के खिलाफ ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने विस्तृत संवैधानिक तर्क पेश किए हैं। बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. एस. क्यू. आर. इलियास ने कहा कि किसी भी छात्र को ऐसा गीत या पाठ गाने के लिए मजबूर करना जो उसकी धार्मिक मान्यताओं के विपरीत हो, पूरी तरह से गलत है। उन्होंने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19, 25 और 28(3) का हवाला देते हुए इसे मौलिक अधिकारों का सीधा हनन बताया है। यह स्थिति अब एक गंभीर कानूनी विवाद की ओर बढ़ती हुई नजर आ रही है।
"किसी भी नागरिक को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध किसी राष्ट्रीय या धार्मिक समारोह में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।" - डॉ. एस. क्यू. आर. इलियास, प्रवक्ता, AIMPLB.
बोर्ड ने मांग की है कि यदि सरकार इस आदेश को वापस नहीं ले सकती, तो मुस्लिम छात्रों को इससे स्पष्ट छूट दी जानी चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक 'बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य' मामले का उल्लेख करते हुए याद दिलाया कि शीर्ष अदालत पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी है कि किसी को भी उसकी अंतरात्मा के विरुद्ध कार्य करने के लिए मजबूर करना असंवैधानिक है। अब देखना यह है कि राज्य सरकार इस बढ़ते विरोध के आगे झुकती है या अपने रुख पर कायम रहती है।
वंदे मातरम अनिवार्य मामले में डॉ. इलियास ने पहली बार यह स्पष्ट किया है कि बोर्ड उन छंदों पर कड़ी आपत्ति जता रहा है जो इस्लाम के एकेश्वरवाद (तौहीद) के सिद्धांत के प्रतिकूल हैं। उनका कहना है कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में एक समुदाय की परंपराओं को दूसरे पर थोपना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। बोर्ड का मानना है कि मुस्लिम छात्रों को बाध्य करना सीधे तौर पर उनकी धार्मिक पहचान और संवैधानिक स्वतंत्रता पर प्रहार है।
"सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार, किसी भी छात्र को उसके धार्मिक विश्वासों के विरुद्ध कोई पाठ पढ़ने के लिए बाध्य करना कानून के खिलाफ है।" - AIMPLB आधिकारिक वक्तव्य।
बोर्ड ने अनुच्छेद 28(3) का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य द्वारा पोषित किसी भी शैक्षणिक संस्थान में किसी भी छात्र को उसकी स्वतंत्र सहमति के बिना धार्मिक निर्देशों या अनुष्ठानों में भाग लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। पश्चिम बंगाल सरकार का यह निर्णय न केवल संविधान की भावना के विपरीत है, बल्कि भारत की धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करने वाला है।
वंदे मातरम अनिवार्य के इस आदेश ने मुस्लिम छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों को अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक होने के लिए प्रेरित किया है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपील की है कि वे किसी भी प्रकार के दबाव या जबरदस्ती के खिलाफ कानूनी उपाय अपनाएं। बोर्ड ने सरकार को चेतावनी दी है कि भारत एक बहुलवादी गणतंत्र है, जहाँ हर समुदाय को अपने विश्वास के अनुसार जीने का पूरा अधिकार है।
क्या सरकार इस फरमान को वापस लेकर मामले को शांत करेगी या फिर टकराव का यह रास्ता और लंबा खिंचेगा? फिलहाल तो स्कूलों और मदरसों के गलियारों में सन्नाटा पसरा है और सभी की नजरें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। यह स्पष्ट है कि यदि सरकार ने अपनी नीति पर पुनर्विचार नहीं किया, तो यह मामला आने वाले दिनों में और अधिक तूल पकड़ेगा।