राजस्थान

भीलवाड़ा टेक्सटाइल उद्योग: बुनकरों के पसीने से संवर रही देश की तकदीर

भीलवाड़ा टेक्सटाइल उद्योग ने विपरीत परिस्थितियों में भी पकड़ी रफ्तार, बांग्लादेश को निर्यात बढ़ने से हजारों हाथों को मिला नया काम।

By अजय त्यागी 1 min read
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प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

भीलवाड़ा, राजस्थान। भीलवाड़ा टेक्सटाइल उद्योग के लिए आज का यह दौर किसी संघर्ष से कम नहीं है, लेकिन इस संघर्ष के बीच एक ऐसी कहानी बुनी जा रही है जो साहस और उम्मीदों का प्रतीक है। मध्य-पूर्व में जारी युद्ध और वैश्विक अस्थिरता के कारण जब दुनिया भर के व्यापारिक केंद्र अपनी साख बचाने के लिए जूझ रहे हैं, तब इस 'टेक्सटाइल सिटी' ने अपनी कड़ी मेहनत के दम पर सफलता की नई इबारत लिख दी है। यह केवल आंकड़ों की वृद्धि नहीं, बल्कि उन हजारों मेहनतकश परिवारों की जीत है, जिनके चूल्हे इस उद्योग से जलते हैं।[1]

जब अन्य कपड़ा हब जैसे पाली, बालोतरा और जोधपुर मंदी के थपेड़ों से सहमे हुए थे, तब भीलवाड़ा के उद्यमियों ने हार नहीं मानी। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों को अवसर में बदला और बांग्लादेश के बाजार में अपनी धाक जमाई। आज भीलवाड़ा का धागा और डेनिम केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में अपनी गुणवत्ता की गवाही दे रहा है। यह उस संकल्प का परिणाम है, जिसने मुश्किल समय में भी उद्योग की धड़कनें रुकने नहीं दीं।

गुणवत्ता और अटूट विश्वास

भीलवाड़ा टेक्सटाइल उद्योग की सबसे बड़ी ताकत उसकी अडिग गुणवत्ता है। आधुनिक तकनीक और ऑटोमेशन को अपनाकर यहां के उद्यमियों ने सूती धागे को इतना भरोसेमंद बना दिया है कि आज बांग्लादेश का रेडिमेड गारमेंट उद्योग पूरी तरह से इसी पर निर्भर है। यह विश्वास रातों-रात नहीं बना, बल्कि दशकों की मेहनत और बुनकरों के उन हाथों का कमाल है, जो दिन-रात एक कर देश के लिए वस्त्र बुनते हैं।

आंकड़ों की बात करें तो सूती धागे के उत्पादन में 15 से 17 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि यहां का श्रम व्यर्थ नहीं जा रहा है। सरकार द्वारा विदेशों से आने वाली कपास पर आयात शुल्क हटाने के निर्णय ने भी इस उद्योग को एक नई ऑक्सीजन दी है। इससे धागे की लागत कम हुई है और अब भीलवाड़ा के उत्पाद वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बन गए हैं। यह निर्णय उन उद्यमियों के लिए राहत लेकर आया है, जो अपनी पूरी पूंजी लगाकर इस व्यवसाय को खड़ा किए हुए हैं।

संकट के बीच उम्मीद

"युद्ध के कारण शुरू में चिंताएं थीं, लेकिन सरकारी प्रयासों से उद्योग पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। पहले बांग्लादेश को निर्यात नाममात्र था, लेकिन अब इसने हमारे टेक्सटाइल उद्योग को एक नया जीवन दिया है," आर.के. जैन, मानद महासचिव, मेवाड़ चैंबर ऑफ कॉमर्स।

आज भीलवाड़ा में 500 से अधिक वीविंग, 18 स्पिनिंग और 21 प्रोसेसिंग इकाइयां हैं, जो न केवल सालाना 120 करोड़ मीटर कपड़े का उत्पादन कर रही हैं, बल्कि 1.5 लाख लोगों को सीधे रोजगार भी दे रही हैं। यह उद्योग एक परिवार की तरह है, जहां हर व्यक्ति की आजीविका एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। मंदी के इस माहौल में भी यहां हर फैक्ट्री में श्रमिकों की मांग होना इस बात को दर्शाता है कि भीलवाड़ा का टेक्सटाइल उद्योग आज भी कितनी मजबूती से खड़ा है।

भविष्य की स्वर्णिम राह

भीलवाड़ा टेक्सटाइल उद्योग का विस्तार आज 3000 करोड़ रुपये के नए निवेश तक पहुंच चुका है। जब दुनिया में छंटनी की खबरें आ रही हैं, तब भीलवाड़ा नए रोजगार के द्वार खोल रहा है। मिस्र, चीन, पुर्तगाल, मैक्सिको और ब्राजील जैसे देशों में भीलवाड़ा के धागे और डेनिम की मांग यह बताती है कि हमारी मेहनत दुनिया में सराही जा रही है। यह केवल एक व्यापार नहीं है, बल्कि राजस्थान के इस छोटे से शहर का वैश्विक मानचित्र पर बढ़ता हुआ मान है।

आने वाले दिन और भी उज्ज्वल नजर आ रहे हैं क्योंकि बड़ी कंपनियां अब यहां अपनी स्पिनिंग और डेनिम इकाइयों का विस्तार कर रही हैं। यह विस्तार उन युवाओं के लिए उम्मीद की एक नई किरण है जो अपने घर से दूर नहीं जाना चाहते। भीलवाड़ा ने साबित कर दिया है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो वैश्विक संकट भी औद्योगिक प्रगति को नहीं रोक सकते। टेक्सटाइल सिटी का यह सफर जारी रहेगा, और आने वाली पीढ़ियां इस संघर्ष और सफलता की कहानी को गर्व के साथ याद रखेंगी।

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