राजनीति

टीएमसी आंतरिक कलह: क्या बिखर जाएगा ममता का बनाया साम्राज्य

टीएमसी आंतरिक कलह के बीच 58 विधायकों ने की बगावत, पार्टी में गहराया सत्ता संघर्ष, ममता बनर्जी ने भंग की सभी संगठनात्मक समितियां।

By अजय त्यागी 1 min read
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प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

कोलकाता, पश्चिम बंगाल। टीएमसी आंतरिक कलह ने आज एक ऐसा मोड़ ले लिया है, जिसने राजनीति के गलियारों में सन्नाटा खींच दिया है। जिस ममता बनर्जी ने कभी इस पार्टी को अपनी खून-पसीने से सींचा था, आज वही संगठन अपनों की बगावत की आग में झुलस रहा है। बुधवार का दिन पार्टी के इतिहास का सबसे काला दिन बन गया, जब 58 बागी विधायकों ने एक साथ खड़े होकर पार्टी से निष्कासित नेता रताब्रत बनर्जी का हाथ थाम लिया और उन्हें अपना नेता चुन लिया।

यह घटना केवल एक राजनीतिक उठापटक नहीं है, बल्कि उस भरोसे का टूटना है जिसे जनता ने विधानसभा चुनावों में भारी जनादेश के साथ सौंपा था। जब ममता बनर्जी के खेमे ने जवाब में पूरे बंगाल की संगठनात्मक समितियों को भंग करने का कठोर कदम उठाया, तो हवाओं में एक ही सवाल गूंज उठा—क्या यह अंत की शुरुआत है? चुनावी हार की चोट से उबरने की कोशिश कर रही पार्टी अब अपनों के ही तीरों से लहूलुहान हो रही है।[1]

अपनों का साथ और अपनों का वार

टीएमसी आंतरिक कलह अब उस बिंदु पर पहुंच गई है जहां पार्टी के दो धड़े एक-दूसरे के सामने सीना तानकर खड़े हैं। एक तरफ रताब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 58 बागी विधायकों का वह जत्था है, जिसने विधानसभा अध्यक्ष तक अपनी आवाज पहुंचा दी है। वहीं दूसरी ओर ममता बनर्जी का खेमा है, जो अपने बचे-खुचे आधार को बचाने के लिए कड़े फैसले ले रहा है। यह संघर्ष केवल कुर्सी का नहीं है, बल्कि पार्टी की आत्मा और उसके वर्चस्व पर कब्जे का है।

राजनीतिक पंडितों के अनुसार, यह चुनौती पार्टी के गठन के बाद से अब तक की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है। जब विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी को एकजुट होने की जरूरत थी, तब इस तरह का विभाजन कार्यकर्ताओं के मनोबल को बुरी तरह तोड़ रहा है। वे कार्यकर्ता, जिन्होंने ममता के नाम पर वोट मांगे थे, आज दुविधा में हैं कि आखिर वे किसके साथ खड़े हों—उस पुरानी विरासत के साथ, या उस नई बगावत के साथ जो सत्ता के गलियारों में नए समीकरण बुन रही है?

"पार्टी के भीतर का यह विद्रोह उस नींव को हिलाने वाला है जिसे दशकों की मेहनत से बनाया गया था। जब घर के लोग ही विरोध में खड़े हो जाएं, तो बाहर की ताकतों की जरूरत नहीं पड़ती," एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक।

विरासत पर छाया संकट

टीएमसी आंतरिक कलह ने अब पार्टी के भविष्य पर एक ऐसा प्रश्नचिह्न लगा दिया है जिसे मिटाना आसान नहीं होगा। क्या पार्टी अपनी संगठनात्मक मशीनरी पर नियंत्रण खो देगी? यह संघर्ष न केवल विधायी विंग को दो हिस्सों में बांट रहा है, बल्कि आम लोगों के बीच पार्टी की छवि को भी धुंधला कर रहा है। विधानसभा चुनावों की करारी हार के बाद उपजी यह निराशा अब आक्रामकता में बदल चुकी है।

ममता बनर्जी के लिए यह समय बेहद चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने सभी संगठनात्मक समितियों को भंग करके एक संदेश तो देने की कोशिश की है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह मरहम इस गहरे घाव को भर पाएगा? कार्यकर्ता आज भ्रमित हैं, और जनता का भरोसा जो पहले ही हिल चुका था, अब और कमजोर होता दिख रहा है। सत्ता की इस लड़ाई में कहीं वह साम्राज्य ही न बिखर जाए, जिसे संवारने में वर्षों लगे थे।

सत्ता के गलियारे की हलचल

टीएमसी आंतरिक कलह का यह दौर बंगाल की राजनीति में आने वाले बड़े तूफानों का संकेत है। जिस तरह से 58 विधायकों ने रताब्रत बनर्जी के नेतृत्व को स्वीकारा है, वह एक संगठित बगावत की ओर इशारा करता है। यह अब महज कुछ नेताओं का असंतोष नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर एक समानांतर सत्ता के उदय का अहसास करा रहा है। ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या ममता बनर्जी अपनी पुरानी छवि और लोकप्रियता के दम पर इस बवंडर को शांत कर पाएंगी?

इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी पार्टी में आंतरिक विद्रोह हुआ है, उसका सबसे बड़ा नुकसान उसके कार्यकर्ताओं को हुआ है। आज ममता बनर्जी और बागी विधायकों के बीच की यह खटास केवल एक पार्टी का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह बंगाल के भविष्य और उसके राजनीतिक दिशा को तय करने वाला एक बड़ा मोड़ बन गया है। अब सभी की नजरें इस पर हैं कि यह 'सत्ता संग्राम' कहां जाकर थमता है और क्या पार्टी फिर से एकजुट हो पाएगी या यह बगावत सब कुछ राख कर देगी।

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