कुश्ती महासंघ विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने विनेश फोगाट मामले को निष्फल माना, खिलाड़ियों और महासंघ के बीच चल रहे गतिरोध पर आई अहम टिप्पणी।
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
नई दिल्ली, दिल्ली। कुश्ती महासंघ विवाद ने लंबे समय से भारतीय खेल जगत और खिलाड़ियों के संघर्ष को एक बड़े सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान कहा कि रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (WFI) द्वारा दायर की गई याचिका, जिसमें पहलवान विनेश फोगाट को चयन ट्रायल में भाग लेने की अनुमति देने वाले दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई थी, अब निष्फल (infructuous) हो चुकी है। यह निर्णय उस लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आया है, जिसने खेल के मैदान से ज्यादा अदालती गलियारों में चर्चा बटोरी थी।[1]
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने साफ कर दिया कि वे उच्च न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियों में गहराई से नहीं जाना चाहते। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस आदेश को उच्च न्यायालय की टिप्पणियों की पुनरावृत्ति न माना जाए। कोर्ट का यह भावुक और न्यायपूर्ण दृष्टिकोण खिलाड़ियों के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाता है, ताकि खेल के मैदान की राजनीति से अलग, न्याय की गरिमा बनी रहे।
सुनवाई के दौरान फेडरेशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एन. गोबर्धन ने अपनी बात रखते हुए कहा कि विनेश फोगाट को चयन ट्रायल में भाग लेने की अनुमति तो दी गई थी, लेकिन वह सफल नहीं हो सकीं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि फोगाट ने वहां पर भारी हंगामा खड़ा कर दिया था। फेडरेशन की तरफ से उच्च न्यायालय द्वारा की गई उन टिप्पणियों पर भी आपत्ति जताई गई, जिनमें फेडरेशन के निर्णयों को 'दुर्भावनापूर्ण' और 'निंदनीय' करार दिया गया था।
अधिवक्ता ने तर्क दिया कि ये तमाम टिप्पणियां हटाई जानी चाहिए क्योंकि मामला अभी सिंगल बेंच के समक्ष लंबित है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत संतुलन साधते हुए सभी विवादित सवालों को खुला छोड़ दिया और मामले को निष्फल मानकर निस्तारित कर दिया। कोर्ट का यह रुख यह दर्शाता है कि कानून का उद्देश्य खेल को बाधित करना नहीं, बल्कि उसे सही दिशा प्रदान करना है, भले ही इसके लिए बड़े संघर्षों से क्यों न गुजरना पड़े।
यह पूरा कुश्ती महासंघ विवाद तब शुरू हुआ था जब एशियन गेम्स 2026 के लिए चयन ट्रायल का मुद्दा सामने आया। 29 मई को शीर्ष अदालत ने विनेश फोगाट को ट्रायल में भाग लेने की अनुमति दी थी, जो पहलवानों के हक के लिए लड़ी जा रही लंबी लड़ाई का एक पड़ाव था। ट्रायल का वह समय खिलाड़ियों के लिए भावनात्मक रूप से बहुत भारी था, जहां एक तरफ करियर का सवाल था, तो दूसरी तरफ फेडरेशन की कठोर नीतियां।
खेल के प्रति खिलाड़ियों का समर्पण और उनका अटूट साहस ही है जो उन्हें हार न मानने की प्रेरणा देता है। विनेश फोगाट का ट्रायल में शामिल होना केवल उनकी व्यक्तिगत लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह उन तमाम रेसलर्स की आवाज थी जो कुश्ती महासंघ विवाद के चलते अपने भविष्य को लेकर चिंतित थे। जीत और हार तो खेल का हिस्सा है, लेकिन इस मामले ने एक नई बहस को जन्म दिया है कि क्या खेल प्रशासन में खिलाड़ियों की गरिमा सबसे ऊपर है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का निपटारा करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि वे खेल प्रशासन में हस्तक्षेप करने के बजाय संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करना उचित समझते हैं। खेल के मैदानों में खिलाड़ियों की पसीने की बूंदें उनकी कड़ी मेहनत का प्रमाण होती हैं, और जब ये बूंदें राजनीतिक या प्रशासनिक खींचतान के कारण जाया होती हैं, तो वह किसी भी राष्ट्र के लिए एक गहरी पीड़ा का विषय होता है।
अदालत ने सभी मुद्दों को खुला छोड़कर यह स्पष्ट संकेत दिया है कि अगर आगे कोई भी विसंगति सामने आती है, तो कानूनी रास्ते हमेशा खुले हैं। अब जबकि मामला निष्फल मानकर बंद कर दिया गया है, उम्मीद की जानी चाहिए कि खेल प्रशासन और खिलाड़ियों के बीच का यह कड़वा अनुभव भविष्य में खेल के सुधार के लिए एक सीख बनेगा। खिलाड़ियों का ध्यान अब केवल एशियन गेम्स 2026 की तैयारियों पर होना चाहिए।