बाल अधिकारों का संरक्षण आज समय की मांग है। बाल विवाह और बाल श्रम जैसी कुरीतियों से हमारे नन्हे बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ा है।
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
पटना, बिहार। बाल अधिकारों का संरक्षण करना न केवल सरकार का दायित्व है, बल्कि यह हम सभी का नैतिक ऋण भी है। आक्रमण के शिकार निर्दोष बच्चों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर पटना उच्च न्यायालय के अधिवक्ता कुमुद रंजन सिंह ने अत्यंत मार्मिक ढंग से इस विषय पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि आज हमारे बच्चों के विरुद्ध हिंसा का दायरा केवल युद्ध और आतंकवाद तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बाल श्रम, बाल विवाह, मानव तस्करी, साइबर शोषण और घरेलू हिंसा जैसी चुनौतियाँ भी मासूमों पर सामाजिक आक्रमण का ही एक क्रूर रूप ले चुकी हैं।
जब हम अपने समाज के उन बच्चों को देखते हैं, जो अपनी किताबों को छोड़कर पेट की भूख मिटाने के लिए श्रम करने को विवश हैं, तो यह केवल उनकी व्यक्तिगत त्रासदी नहीं होती, बल्कि यह पूरे समाज की संवैधानिक और सामाजिक विफलता का प्रमाण है। एक बालिका का बचपन, जिसे खिलौनों से खेलना चाहिए, यदि वह कम उम्र में विवाह की बेड़ियों में जकड़ दी जाती है, तो यह आने वाली पीढ़ियों के सपनों का गला घोंटने जैसा है।
बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बाल अधिकारों का संरक्षण करना एक अत्यंत बड़ी चुनौती बन गया है। बिहार की कुल आबादी का लगभग 46 प्रतिशत हिस्सा बच्चे हैं, जिनकी संख्या लगभग 4.7 करोड़ है। संसाधनों की कमी और सामाजिक असमानता के कारण, यहाँ का बड़ा वर्ग आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। इन बच्चों की मुस्कान छीनी जा रही है और उनके अधिकारों का हनन हो रहा है, जो किसी भी राष्ट्र के लिए अत्यंत चिंताजनक स्थिति है।
अधिवक्ता सिंह ने जोर देकर कहा कि बाल विवाह और बाल श्रम जैसी जड़ें अभी भी हमारे समाज में गहराई तक धंसी हुई हैं। सरकारी आंकड़े और विभिन्न शोध इस बात की गवाही देते हैं कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में बाल विवाह के मामलों की संख्या चिंताजनक रूप से सर्वाधिक है। यह हमारे समाज के उस काले सच को दर्शाता है, जिसे मिटाने के लिए हमें अब और अधिक दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।
बिहार सरकार द्वारा बाल श्रम उन्मूलन और बच्चों के संरक्षण के लिए कई सराहनीय पहलें की गई हैं, जिनमें बाल श्रमिकों के पुनर्वास और उनकी ट्रैकिंग की व्यवस्था प्रमुख है। हालांकि, केवल सरकारी प्रयासों से यह जंग नहीं जीती जा सकती। जब तक समाज के हर स्तर पर प्रशासन, न्यायपालिका, विद्यालय, अभिभावक और आम नागरिक एकजुट नहीं होंगे, तब तक बच्चों के शोषण का यह सिलसिला थमता हुआ नजर नहीं आता।
अधिवक्ता कुमुद रंजन सिंह ने युवाओं, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से भावुक अपील की है कि वे बाल अधिकारों का संरक्षण करने के लिए जनजागरूकता अभियान को अपना कर्तव्य बनाएं। उन्होंने कहा कि यदि कहीं भी कोई बच्चा शोषण का शिकार हो रहा है, तो उसकी सूचना तुरंत अधिकारियों तक पहुंचाना एक जागरूक नागरिक का प्रथम धर्म है। हमारे सामूहिक प्रयासों से ही हम बच्चों के जीवन में नई आशा का संचार कर सकते हैं।
“"किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति उसके बच्चों की मुस्कान, सुरक्षा और शिक्षा से मापी जाती है। जब तक समाज का अंतिम बच्चा भी भय, शोषण और असुरक्षा से मुक्त नहीं होगा, तब तक विकास की हमारी यात्रा अधूरी रहेगी। बचपन को सुरक्षा, शिक्षा और सम्मान देना केवल दायित्व नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा नैतिक ऋण है।" ”
- कुमुद रंजन सिंह