रेपो रेट में लगातार दूसरी बार कोई बदलाव नहीं। बढ़ती महंगाई और वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच आम आदमी के बजट पर पड़ने वाले असर की पूरी जानकारी।
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा
रेपो रेट में बदलाव नहीं होने का निर्णय एक बार फिर सुर्खियों में है, जहाँ केंद्रीय बैंक ने लगातार दूसरी बार ब्याज दरों को स्थिर रखने का कठिन फैसला लिया है। यह निर्णय उस समय आया है जब वैश्विक स्तर पर उथल-पुथल का माहौल है और पश्चिमी एशिया में चल रहे संघर्ष ने देश के आर्थिक भविष्य पर एक गहरा साया डाल दिया है।
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह दौर चुनौतियों से भरा है, जहाँ ऊर्जा की बढ़ती कीमतें और आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली बाधाएं आम लोगों के जीवन को सीधे प्रभावित कर रही हैं। पश्चिमी एशिया में पिछले तीन महीनों से जारी संघर्ष ने कच्चे तेल की कीमतों में उछाल पैदा किया है, जिससे आयात पर निर्भर देशों के लिए राजकोषीय दबाव और महंगाई का बोझ बढ़ना स्वाभाविक है।[विडियो लिंक...]
वैश्विक अर्थव्यवस्था आज बेहद अनिश्चित समय से गुजर रही है, जहाँ व्यापारिक रास्तों में बाधाएं और आपूर्ति शृंखला का टूटना एक बड़ी चिंता का विषय बन चुका है। बाजार में लगातार बढ़ती अस्थिरता और व्यवसायों में व्याप्त डर का माहौल स्पष्ट दिखाई दे रहा है, जो मध्यम और निम्न वर्गीय परिवारों के बजट पर भारी पड़ रहा है।
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने हालिया मौद्रिक नीति समिति की बैठक में सर्वसम्मति से रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर ही बनाए रखने का निर्णय लिया है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था पिछली बार की तुलना में कहीं अधिक मजबूत आधारों के साथ इस वैश्विक संकट का सामना करने के लिए तैयार है।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा महंगाई दर अप्रैल में 3.48 प्रतिशत रही है, जो आरबीआई के 4 प्रतिशत के लक्ष्य के करीब है। आने वाले महीनों में कमजोर मानसून की संभावना और ईंधन की कीमतों में संभावित वृद्धि आम आदमी की थाली और बजट को प्रभावित कर सकती है।
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इस पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा: [विडियो लिंक...]
"पिछले कुछ महीनों में, वैश्विक अर्थव्यवस्था को बढ़ती अनिश्चितता, प्रमुख व्यापारिक मार्गों और आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान, बढ़ती बाजार अस्थिरता और सतर्क व्यावसायिक धारणाओं ने आकार दिया है। मैं सबसे पहले इस बात पर जोर देना चाहता हूँ कि भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक अशांति के इस दौर में पिछली समान स्थितियों की तुलना में बहुत बेहतर आधारों के साथ प्रवेश कर चुकी है। हम इन झटकों को कम से कम दर्द के साथ सहन करने के लिए आश्वस्त हैं।"
रेपो रेट के स्थिर रहने से कर्ज लेने वालों को फिलहाल राहत तो मिली है, लेकिन भविष्य के अनिश्चित बादल अभी भी मंडरा रहे हैं। जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो उसका असर परिवहन से लेकर रोजमर्रा की वस्तुओं तक पड़ता है। ऐसे में रेपो रेट का नहीं बढ़ना एक बड़ा निर्णय है जो विकास की गति बनाए रखने के लिए लिया गया है।
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