राजस्थान

अपना घर आश्रम कैसे बना बिछड़ों के मिलन का जरिया

अपना घर आश्रम की बदौलत पच्चीस साल बाद मां का अपने बच्चों से भावुक मिलन हुआ। वर्षों से मृत मानी जा रही महिला का हुआ परिवार से अद्भुत पुनर्मिलन।

By अजय त्यागी 1 min read
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पच्चीस साल बाद मां का अपने बच्चों से भावुक मिलन

भरतपुर, राजस्थान। कभी-कभी जिंदगी ऐसी कहानियां लिखती है जिन पर विश्वास करना मुश्किल हो जाता है। ऐसा ही एक भावुक और आंखें नम कर देने वाला दृश्य शुक्रवार को अपना घर आश्रम भरतपुर में देखने को मिला, जहां एक मां का अपनी बेटियों बेटे और दामाद से पूरे पच्चीस साल बाद मिलन हुआ। परिवार ने जिस मां को वर्षों पहले खो दिया था और जिसे मृत मानकर जीवन की राह पर आगे बढ़ गया था, वह अपना घर आश्रम में उनके सामने जीवित खड़ी थी।[1]

अपना घर आश्रम में हुआ यह मिलन साबित करता है कि अटूट विश्वास और सेवा से नामुमकिन को भी मुमकिन किया जा सकता है। सुखदेई के परिवार के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। वर्षों के लंबे इंतजार और गहरे दुखों के बाद यह पुनर्मिलन उस खुशी का गवाह बना जिसे शब्दों में बयां करना असंभव है। सुखदेई अब अपने परिवार के साथ एक नई शुरुआत करने की दहलीज पर हैं।

गुमनामी का लंबा सफर

यह कहानी है उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के आकमपुर गांव निवासी सुखदेई की। करीब पच्चीस वर्ष पहले मानसिक अवसाद के कारण वह घर से निकल गई थीं और फिर कभी वापस नहीं लौटीं। उस समय उनकी दोनों बेटियां महज सात और दस वर्ष की थीं, जबकि बेटा रोहित केवल ढाई साल का था। पति बचन ने पत्नी की तलाश में हरसंभव प्रयास किए, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला और उम्मीदें धीरे-धीरे दम तोड़ने लगीं।

समय बीतता गया और परिवार ने मां के बिना ही अपना बचपन गुजारा। पिता ने अकेले संघर्ष करते हुए बच्चों का पालन-पोषण किया और दोनों बेटियों की शादी भी कर दी। लेकिन परिवार की जिंदगी में एक और दुख तब आया, जब वर्ष दो हजार बाईस में पति बचन का भी निधन हो गया। इसके बाद परिवार को पूरी तरह यकीन हो गया कि सुखदेई अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

पुनर्वास की अनूठी प्रक्रिया

अपना घर आश्रम संस्थापक डॉ बीएम भारद्वाज ने बताया कि सोलह सितंबर, दो हजार पच्चीस को अपना घर आश्रम, जोधपुर की रेस्क्यू टीम को सुखदेई बेसहारा अवस्था में मिलीं। उन्हें उपचार, सेवा और पुनर्वास के लिए अपना घर आश्रम, भरतपुर लाया गया। यहां लगातार देखभाल और चिकित्सा के बाद उनकी मानसिक स्थिति में सुधार हुआ। धीरे-धीरे उन्हें अपने गांव और परिवार की याद आने लगी और उन्होंने अपना पता उन्नाव जिले के आकमपुर गांव का बताया।

आश्रम की पुनर्वास टीम ने इस जानकारी को आधार बनाते हुए परिवार की तलाश शुरू की और आखिरकार उनके परिजनों से संपर्क स्थापित कर लिया। सूचना मिलते ही शुक्रवार को बेटी सोमवती, बेटा रोहित, दामाद धनपाल और ग्राम प्रधान प्रतिनिधि गोकरण आश्रम पहुंचे। पच्चीस वर्षों का लंबा अंतराल और समय के बदलाव के कारण पहली नजर में कोई भी एक-दूसरे को पहचान नहीं पाया।

भावुक कर देने वाला मिलन

जब आश्रम प्रशासन ने परिचय कराया तो मां और बच्चों की आंखों से आंसू छलक पड़े। बेटियां मां से लिपटकर रोने लगीं और वर्षों का बिछोह एक पल में सिमट गया। वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। यह मिलन अपना घर आश्रम की उस सेवा भावना का प्रतिफल था, जिसने एक टूट चुके परिवार को पुनः जोड़ दिया। सुखदेई को अब अपनों के बीच पाकर हर कोई भावुक था।

मिलन के इस पल पर आश्रम के संस्थापक ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा:

"अपना घर आश्रम का मुख्य उद्देश्य केवल बेसहारा लोगों को छत देना नहीं, बल्कि उन्हें उनके अपनों तक वापस पहुँचाकर उनके जीवन में खुशियाँ लौटाना है।"

यह कथन आश्रम की कार्यप्रणाली और उनकी उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसके कारण आज हजारों लोग अपने परिवार से दोबारा मिल पा रहे हैं। सुखदेई की कहानी यह याद दिलाती है कि सही देखभाल और सहानुभूति के साथ किसी के भी जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। अपना घर आश्रम का यह प्रयास समाज में आशा की एक नई किरण जगाता है, जो यह विश्वास दिलाता है कि खोए हुए अपनों का मिलना अब भी संभव है।

कन्यादान का अधूरा सपना

सुखदेई को आज भी इस बात का गहरा अफसोस है कि वह अपनी दोनों बेटियों का कन्यादान नहीं कर सकीं। मां के रूप में यह अधूरापन उन्हें हमेशा सालता रहा। हालांकि अब वह अपने पूरे परिवार को सुखी और सुरक्षित देखकर बेहद खुश हैं। दोनों बेटियां अपने-अपने परिवार में खुशहाल जीवन बिता रही हैं, जबकि बेटा रोहित राजमिस्त्री का काम कर परिवार की जिम्मेदारियां संभाल रहा है।

अपना घर आश्रम ने न केवल एक महिला को नया जीवन दिया, बल्कि एक परिवार को उनकी खोई हुई खुशियाँ भी लौटा दीं। सुखदेई का अपने बच्चों के साथ घर लौटना इस बात का प्रमाण है कि इंसानियत की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। अपना घर आश्रम का यह प्रयास समाज में आशा की एक नई किरण जगाता है, जो यह विश्वास दिलाता है कि खोए हुए अपनों का मिलना अब भी संभव है।

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