ऐरठा गांव में सड़क न होने से ग्रामीण परेशान। बुनियादी सुविधाओं के अभाव में गर्भवती महिला को पांच किलोमीटर पैदल चलकर अस्पताल ले जाने को मजबूर।
गर्भवती को पैदल ले गए ग्रामीण
देवाल, उत्तराखंड। एक तरफ देश में विकास की बयार बहने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ चमोली जिले के देवाल ब्लॉक का ऐरठा गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ रहा है। आजादी के इतने दशक बीत जाने के बाद भी यहां के लोग एक अदद सड़क के लिए तरस रहे हैं। सड़क के बिना जीवन की गाड़ी यहां के ग्रामीणों के लिए किसी संघर्ष से कम नहीं है, जहां हर कदम पर उन्हें भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।[1]
इस बदहाली का ताजा और हृदयविदारक उदाहरण रविवार को देखने को मिला। गांव की गोमती देवी प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी, लेकिन गांव तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क का नामोनिशान तक नहीं था। मजबूरन ग्रामीणों ने अपनी जान पर खेलकर उन्हें डंडी के सहारे पांच किलोमीटर तक उबड़-खाबड़ रास्तों से पैदल चलकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र देवाल पहुंचाया। यह घटना उन सभी सरकारी दावों की पोल खोलने के लिए काफी है, जो कागजों पर तो विकास की गाथा गाते हैं लेकिन धरातल पर सिर्फ उदासीनता ही नजर आती है।
सड़क के अभाव में यह गांव पूरी तरह से सुविधाओं से कट चुका है, जिसका खामियाजा गर्भवती महिलाओं से लेकर बीमार बुजुर्गों तक को भुगतना पड़ रहा है। ग्रामीणों के अनुसार, अनुसूचित जाति बाहुल्य इस गांव की बदकिस्मती देखिए कि ऐरठा के लिए साल 2021 में आठ किलोमीटर लंबी सड़क स्वीकृत की गई थी। स्वीकृति मिले पांच साल बीत चुके हैं, लेकिन आज भी गांव सड़क से नहीं जुड़ पाया है। यह लापरवाही न केवल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है, बल्कि ग्रामीणों के प्रति संवेदनहीनता को भी दर्शाती है।
विकास के इस कछुआ चाल से परेशान गांव के भवान राम, प्रताप राम, कैलाश, खिलाप, नंदन, प्रकाश राम, दयाल, प्रमिला देवी, विमला देवी और हिमांती सहित अन्य ग्रामीणों का कहना है कि वे कब तक अपनी जान को जोखिम में डालकर ढोते रहेंगे। अस्पताल तक पहुंचने के लिए सड़क जैसी बुनियादी सुविधा का न होना, क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार अधिकारियों की विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है। बुनियादी सुविधाओं के अभाव में लोगों का कहना है कि क्या गांव की जनता केवल चुनावों में ही याद आती है?
ग्रामीणों की इस पीड़ा पर जब लोक निर्माण विभाग (लोनिवि) के अधिकारियों का पक्ष जाना गया, तो जवाब फिर से वही पुरानी फाइलों और आपत्तियों का निकला। लोनिवि के एई जेके टम्टा ने बताया कि स्वीकृत आठ किमी लंबी पदमल्ला-कंजेरू-ऐरठा मार्ग की फाइल फिलहाल लंबित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस मार्ग के निर्माण को लेकर पदमल्ला के कुछ ग्रामीणों ने आपत्ति दर्ज की है, जिसके चलते फाइल आगे नहीं बढ़ पा रही है।
अधिकारियों का यह तर्क उन ग्रामीणों के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है, जो रोजमर्रा की जिंदगी में मौत से जूझ रहे हैं। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि आपसी आपत्तियों के निपटारे में विभाग की सुस्ती ही उस मासूम प्रसव पीड़ा से पीड़ित महिला की परेशानी का असली कारण है। आखिर कब तक फाइलें आपत्तियों के नाम पर लोगों की बुनियादी सुविधाओं के अभाव में रास्ता रोककर रखेंगी? विकास के इस घोर अभाव पर गांव की ग्राम प्रधान प्रेम देवी ने गहरा रोष जताते हुए प्रशासन की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया है।
इस पूरी स्थिति को देखकर एक ही बात समझ आती है कि एक तरफ विकास के इतने बड़े-बड़े दावे और दूसरी तरफ जमीनी हकीकत, आजादी के इतने सालों बाद भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जनता पिस रही है। यह विरोधाभास किसी को भी सोचने पर मजबूर कर देता है कि आखिर आम आदमी का जीवन इतना सस्ता क्यों हो गया है। क्या गांव के लोग नागरिक नहीं हैं या उनकी पीड़ा सरकार के कानों तक नहीं पहुंचती? ऐसे में सवाल उठता है कि कब खत्म होगा यह डंडी का दौर और कब ऐरठा गांव के लोगों को मिलेगा पक्की सड़क का सुख।
अस्वीकरण (Disclaimer):
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