राजस्थान

किसान जागरूकता: आधुनिक खेती और जल संरक्षण पर जोर

पशुचिकित्सा महाविद्यालय द्वारा गोद लिए गाँव में आयोजित किसान जागरूकता शिविर में किसानों को टिकाऊ खेती, मृदा स्वास्थ्य और जल संचयन के आधुनिक तौर-तरीके सिखाए गए।

By अजय त्यागी 1 min read
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किसान जागरूकता एवं जल संरक्षण प्रबंधन कार्यक्रम

बीकानेर, राजस्थान। बीकानेर के पशुचिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय द्वारा विश्वविद्यालय सामाजिक दायित्व (यूएसआर) के तहत एक सराहनीय पहल की गई है। गोद लिए गए गाँव बम्बलू के अटल सेवा केंद्र में मंगलवार को 'खेत बचाओ अभियान' के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण किसान जागरूकता एवं जल संरक्षण प्रबंधन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस आयोजन का प्राथमिक उद्देश्य स्थानीय किसानों को कृषि क्षेत्र में आ रहे नवाचारों, टिकाऊ खेती की तकनीकों और जल के विवेकपूर्ण उपयोग के प्रति शिक्षित और प्रोत्साहित करना था।

कार्यक्रम में कृषि पर्यवेक्षक महावीर गोदारा ने किसानों का मार्गदर्शन करते हुए मूंग और ग्वार की वैज्ञानिक खेती करने की बारीकियों को समझाया। उन्होंने फसलों में संतुलित पोषण प्रबंधन के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के सीमित व संतुलित उपयोग पर विशेष जोर दिया। किसानों को यह भी प्रेरित किया गया कि वे खेती में जैविक उर्वरकों को प्राथमिकता दें, ताकि न केवल उत्पादन की गुणवत्ता बढ़े बल्कि मिट्टी का स्वास्थ्य भी लंबे समय तक सुरक्षित रह सके।

आधुनिक कृषि और मृदा प्रबंधन

आधुनिक दौर में कृषि की उत्पादकता बढ़ाने के लिए किसान जागरूकता अत्यंत अनिवार्य हो गई है। मृदा स्वास्थ्य की अनदेखी के कारण खेती की उपजाऊ क्षमता घट रही है, जिसके लिए मृदा परीक्षण एक अचूक समाधान है। कार्यक्रम के दौरान वेटरनरी महाविद्यालय की यूएसआर समन्वयक डॉ. प्रियंका कड़ेला ने उपस्थित किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड के लाभों के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि मृदा परीक्षण करवाकर ही किसान यह जान सकते हैं कि उनकी भूमि को किन पोषक तत्वों की आवश्यकता है।

डॉ. कड़ेला ने किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड बनवाने के लिए प्रेरित किया ताकि वे अपनी फसल की जरूरतों के अनुसार ही उर्वरकों का सही उपयोग कर सकें। इसके अतिरिक्त, जल संरक्षण एवं प्रबंधन की विभिन्न सरकारी योजनाओं की जानकारी देते हुए उन्होंने वर्षा जल संचयन को अपनी खेती का अभिन्न हिस्सा बनाने पर बल दिया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार सीमित जल संसाधनों के उचित प्रबंधन से किसान कम पानी में भी अधिक पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।

"किसानों को मूंग व ग्वार की वैज्ञानिक खेती करने, फसलों में संतुलित पोषण प्रबंधन एवं जैविक उर्वरक का खेती में उपयोग करने के बारे में जानकारी दी गई।"

टिकाऊ खेती की राह

बम्बलू गाँव के किसानों के लिए यह कार्यक्रम एक नई राह दिखाने वाला सिद्ध हुआ। इस आयोजन में हेतराम कूकणा, मनोज कुमार और अन्य ग्रामवासियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई और कृषि विशेषज्ञों से अपने खेतों से जुड़े सवाल पूछे। किसानों ने जैविक उर्वरकों के उपयोग और आधुनिक यंत्रों के बारे में अपनी जिज्ञासाएँ रखीं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की किसान जागरूकता गतिविधियों से ग्रामीण अंचल में खेती के प्रति एक नया दृष्टिकोण पैदा होगा।

जल संरक्षण आज न केवल एक आवश्यकता है, बल्कि भविष्य की कृषि की सबसे बड़ी चुनौती भी है। विशेषज्ञों ने किसानों को सिखाया कि कैसे वे अपनी सिंचाई पद्धतियों में सुधार करके पानी की बर्बादी रोक सकते हैं। बम्बलू जैसे गाँवों में जहाँ जल स्तर की समस्या हो सकती है, वहाँ वर्षा जल संचयन ही एकमात्र विकल्प है। कृषि विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में किसानों ने संकल्प लिया कि वे अपनी खेती में आधुनिक पद्धतियों को अपनाकर भविष्य के लिए जल और मिट्टी दोनों को संरक्षित करेंगे।

सतत विकास का संकल्प

निष्कर्षतः, पशुचिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय बीकानेर का यह प्रयास सतत कृषि विकास की दिशा में एक बड़ा कदम है। केवल पशुओं के स्वास्थ्य तक सीमित न रहकर विश्वविद्यालय का समाज के प्रति यह समर्पण किसानों के जीवन में वास्तविक बदलाव लाने में सक्षम है। यदि किसान इन वैज्ञानिक तकनीकों को अपनी दिनचर्या में शामिल करें, तो निश्चित रूप से उनकी आय में वृद्धि होगी। इस प्रकार के निरंतर किसान जागरूकता अभियानों से ही कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का सपना साकार हो सकेगा।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसी एवं स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचनात्मक उद्देश्य से किया गया है। कृषि संबंधित तकनीकों और योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए कृषि विभाग के आधिकारिक निर्देशों का पालन करना उचित है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक उत्तरदायी नहीं हैं।

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