जनकवि हरीश भदानी जी की पुण्यतिथि के इस भावुक क्षण पर उनके व्यक्तित्व, गहन जीवन संघर्ष और अमूल्य स्मृतियों को साझा करते हुए स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता हूँ।
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
आज जब समय के झरोखे से पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो जनकवि हरीश भदानी जी की स्मृतियाँ मेरी आँखों के सामने सजीव हो उठती हैं। आज उनकी पुण्यतिथि के इस भावुक क्षण पर उन्हें याद करते हुए मेरा मन श्रद्धा से भर आया है। मैं भला उस पल को कैसे भूल सकता हूँ, जब उन्होंने मुझे पत्रकारिता के क्षेत्र में मेरी विशेष उपलब्धियों के लिए अपने कर-कमलों से सम्मानित किया था; वह सम्मान मेरे जीवन का सबसे गौरवपूर्ण अध्याय है।
ग्यारह जून उन्नीस सौ तैंतीस को हमारी बीकानेर की इसी मरुधरा पर जन्मे हरीश भदानी जी की प्राथमिक शिक्षा घर के पारंपरिक माहौल में ही हिंदी, महाजनी और संस्कृत के साथ हुई थी। वे चाहते तो एक सुगम जीवन जी सकते थे, लेकिन उन्होंने जानबूझकर संघर्षों के मार्ग को चुना। यही कारण था कि उनकी जीवन यात्रा सड़क से शुरू होकर जेल की सलाखों तक पहुँची, जिसके कारण उन्हें समाज के उतार-चढ़ावों को बहुत करीब से देखने का अनुभव मिला।
जनकवि हरीश भदानी जी ने अपने जीवन का एक बहुत बड़ा और रचनात्मक हिस्सा कोलकाता तथा बीकानेर के बीच साहित्य की अनवरत साधना करते हुए बिताया था। मुझे अच्छी तरह याद है कि वे वर्ष 1960 से 1974 तक सुप्रसिद्ध मासिक पत्रिका 'वातायन' के यशस्वी संपादक रहे, जहाँ उन्होंने नए लेखकों को निखारा। इसके साथ ही कोलकाता से निकलने वाली मार्क्सवादी त्रैमासिक पत्रिका 'कलम' से भी उनका गहरा वैचारिक जुड़ाव था, जहाँ वे शोषितों की मजबूत आवाज बने।
आम जनमानस के प्रति उनकी चिंता गहरी थी, इसीलिए उन्होंने प्रौढ़ शिक्षा और अनौपचारिक शिक्षा जैसे जमीनी विषयों पर राजस्थानी भाषा में लगभग बीस से पच्चीस पुस्तिकाएं लिखीं। मातृभाषा के प्रति उनका अगाध प्रेम ही था जिसके कारण राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करवाने के आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। इसी दौर में उनकी अद्भुत कृति 'सयुजा सखाया' भी प्रकाशित हुई थी, जिसने विद्वानों का ध्यान खींचा।
साहित्य के क्षेत्र में जनकवि हरीश भदानी जी के इसी अद्वितीय अवदान के लिए उन्हें राजस्थान साहित्य अकादमी के सर्वोच्च 'मीरा' पुरस्कार, प्रियदर्शिनी अकादमी सम्मान और के.के. बिड़ला फाउंडेशन के 'बिहारी' पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके साथ ही उन्हें पश्चिम बंग हिंदी अकादमी द्वारा 'राहुल' सम्मान, परिवार अकादमी महाराष्ट्र तथा उदयपुर की विभिन्न संस्थाओं द्वारा 'विशिष्ट साहित्यकार', 'एक उजली नजर की सुई' और 'पितृकल्प' जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया।
उनकी कालजयी कृतियों में 'अधूरे गीत', 'सपन की गली', 'हँसिनी याद की', 'सुलगते पिण्ड', 'नष्टो मोह' और 'सन्नाटे के शिलाखंड पर' आज भी साहित्य की धरोहर हैं। उन्होंने 'रोटी नाम सत है', 'सड़कवासी राम', 'आज की आंख का सिलसिला' और 'मैं मेरा अष्टावक्र' जैसी अद्भुत रचनाएँ हमें दीं। उनकी कविता 'रोटी नाम सत है, खाए से मुगत है' आज भी व्यवस्था के पाखंड पर चोट करती है। अंततः, इन्हीं विचारों के साथ जनकवि हरीश भदानी जी की एक रचना उन्हें श्रृद्धांजली स्वरुप समर्पित-
रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है
ऐरावत पर इंदर बैठे
बांट रहे टोपियां
झोलिया फैलाये लोग
भूग रहे सोटियां
वायदों की चूसणी से
छाले पड़े जीभ पर
रसोई में लाव-लाव
भैरवी बजत है
रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है
बोले खाली पेट की
करोड़ क्रोड़ कूडियां
खाकी वरदी वाले भोपे
भरे हैं बंदूकियां
पाखंड के राज को
स्वाहा-स्वाहा होमदे
राज के बिधाता सुण
तेरे ही निमत्त है
रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है
बाजरी के पिंड और
दाल की बैतरणी
थाली में परोसले
हथाली में परोसले
दाता जी के हाथ
मरोड़ कर परोसले
भूख के धरम राज
यही तेरा ब्रत है
रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है।
पुण्यस्मरण- मनोहर चावला
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