उत्तर प्रदेश

बयानबाजी के बाद कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह को नोटिस भेजा गया

राम मंदिर निर्माण के लिए दिए गए चंदे को वापस मांगने संबंधी बयान पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह को नोटिस भेजकर कानूनी जवाब मांगा गया है।

By अजय त्यागी 1 min read
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वरिष्ठ अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी

वाराणसी, उत्तर प्रदेश। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह द्वारा राम मंदिर निर्माण के लिए दिए गए चंदे को वापस मांगने संबंधी बयान पर विवाद गहरा गया है। वाराणसी के एक वरिष्ठ अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी ने इस बयान पर आपत्ति जताते हुए दिग्विजय सिंह को नोटिस भेजा है। यह कानूनी कदम उनके निजी स्तर पर और एक राम भक्त की जिम्मेदारी के रूप में उठाया गया है। नोटिस की प्रतियां अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और महासचिव को भी भेजी गई हैं। [1]

बयान पर कानूनी आपत्ति

अधिवक्ता त्रिपाठी जो भाजपा विधि प्रकोष्ठ के काशी क्षेत्र के संयोजक भी हैं ने बताया कि दिग्विजय सिंह को नोटिस उनके उस बयान के बाद दिया गया है जिसमें उन्होंने चंदा वापसी के लिए अदालत जाने की बात कही थी। दिग्विजय सिंह ने भोपाल में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि उन्होंने मंदिर निर्माण के लिए एक लाख ग्यारह हजार रुपये का दान दिया था और अब वे ट्रस्ट के खिलाफ मुकदमा दायर करने पर विचार कर रहे हैं।

दिग्विजय सिंह को नोटिस में संपत्ति अंतरण अधिनियम अट्ठारह सौ बयासी की धारा एक सौ छब्बीस का हवाला दिया गया है। इसके अनुसार स्वेच्छा से और बिना किसी शर्त के दिया गया दान केवल विचार बदलने के आधार पर वापस नहीं मांगा जा सकता है। अधिवक्ता ने कहा कि भगवान राम किसी राजनीतिक दल के नहीं हैं बल्कि वे देश की सांस्कृतिक गरिमा और आस्था के प्रतीक हैं इसलिए उनके बाल रूप के सामने ऐसी मांग करना धार्मिक रूप से भी अनुचित है।

निजी आय से भुगतान 

वाराणसी के वकील ने दिग्विजय सिंह को नोटिस जारी करते हुए एक अनोखा प्रस्ताव भी दिया है। उन्होंने कहा है कि यदि कांग्रेस नेता वास्तव में अपनी दान राशि वापस चाहते हैं तो उन्हें राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट या किसी धार्मिक संस्था को परेशान करने की जरूरत नहीं है। वे खुद अपनी वैध निजी कमाई से दिग्विजय सिंह को एक लाख ग्यारह हजार रुपये की पूरी राशि नकद भुगतान करने के लिए तैयार हैं।

इसके लिए उन्होंने कांग्रेस नेता को मूल रसीद के साथ वाराणसी आने का निमंत्रण दिया है। वे वहां आकर यह राशि ले सकते हैं और एक लिखित पावती दे सकते हैं कि भविष्य में ट्रस्ट के खिलाफ उनका कोई दावा नहीं रहेगा। इस कदम से मंदिर की पवित्रता और भक्तों की आस्था को राजनीतिक विवादों से दूर रखने में मदद मिलेगी। हालांकि इस भुगतान से किसी भी वित्तीय अनियमितता की निष्पक्ष जांच कराने के उनके अधिकार पर कोई कानूनी असर नहीं पड़ेगा।

आरोपों पर कड़ा रुख

राम मंदिर में चढ़ावे की गिनती के दौरान हुई हालिया चोरी की घटनाओं पर भी अधिवक्ता ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि जो भी लोग इस वित्तीय गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार हैं उन्हें कानून के तहत सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। उन्होंने मनुस्मृति का उदाहरण देते हुए कहा कि जो लोग सुरक्षा और प्रबंधन के लिए जिम्मेदार थे और उन्होंने ही चोरी की है उन्हें सामान्य से चार गुना अधिक कड़े दंड का भागी होना चाहिए।

विशेष जांच दल यानी एसआईटी की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में भी सीसीटीवी फुटेज के आधार पर कर्मचारियों द्वारा नकदी छिपाने के सत्तर मामलों की पुष्टि हुई है। इस जांच के तहत छह आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज कर बड़ी मात्रा में नकदी बरामद की जा चुकी है। अधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि चंदे के पैसों का दुरुपयोग एक अलग आपराधिक मामला है जिसकी जांच स्वतंत्र रूप से होनी चाहिए लेकिन इसके बहाने पूरे मंदिर प्रबंधन को बदनाम करना गलत है।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। यह रिपोर्ट अयोध्या राम मंदिर के चंदे से जुड़े राजनीतिक विवाद और वाराणसी में जारी कानूनी घटनाक्रम को दर्शाती है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

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