श्रृद्धांजलि

सैकड़ों गांवों को जोड़ने वाले ब्रिज मैन ऑफ इंडिया का निधन

ग्रामीण भारत में कनेक्टिविटी की क्रांति लाने वाले ब्रिज मैन ऑफ इंडिया पद्मश्री गिरीश भारद्वाज का छिहत्तर वर्ष की आयु में निजी अस्पताल में निधन।

By अजय त्यागी 1 min read
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ब्रिज मैन ऑफ इंडिया पद्मश्री गिरीश भारद्वाज

दक्षिण कन्नड़, कर्नाटक। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की अभूतपूर्व क्रांति लाने वाले और ब्रिज मैन ऑफ इंडिया के रूप में विख्यात पद्मश्री गिरीश भारद्वाज का मंगलवार को दुखद निधन हो गया। छिहत्तर वर्षीय भारद्वाज ने कर्नाटक के सुल्लिया स्थित केवीजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। वह पिछले कुछ दिनों से हृदय संबंधी गंभीर बीमारी से पीड़ित थे और स्वास्थ्य अचानक अधिक बिगड़ने के बाद उन्हें भर्ती कराया गया था। उनके निधन से देश ने एक महान सामाजिक कार्यकर्ता और अद्वितीय तकनीकी विशेषज्ञ खो दिया है जिसके बाद सुल्लिया की तहसीलदार मंजुला सहित कई प्रमुख हस्तियों ने गहरा शोक जताया है।

मैकेनिक इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद गिरीश भारद्वाज ने बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आकर्षक नौकरी के प्रस्तावों को पूरी तरह ठुकरा दिया था क्योंकि उनका एकमात्र उद्देश्य ग्रामीण लोगों को सशक्त बनाना था। उन्होंने अपने तकनीकी ज्ञान का उपयोग समाज के उस अंतिम तबके के कल्याण के लिए किया जो मुख्यधारा से पूरी तरह कटे हुए थे। मानसून के समय उफनती नदियों के कारण जो बच्चे स्कूल नहीं जा पाते थे या ग्रामीण इलाज के लिए तड़पते थे उनके जीवन को सुगम बनाने के लिए भारद्वाज ने लटकते पुलों का निर्माण शुरू किया था। [1]

अनोखा योगदान

ब्रिज मैन ऑफ इंडिया गिरीश भारद्वाज ने साल उन्नीस सौ नवासी में सुल्लिया की पयस्विनी नदी पर स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्रियों और सीमित बजट से अपना पहला लटकता हुआ पुल बनाया था जिसने उनके जीवन को एक नई दिशा दी। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और कर्नाटक केरल आंध्र प्रदेश तथा ओडिशा जैसे विभिन्न राज्यों के सुदूर इलाकों में तीन सौ से अधिक पर्यावरण अनुकूल लटकते पुलों का निर्माण कर डाला। उनके इस अद्वितीय और निस्वार्थ समर्पण के कारण ही उन्हें पूरे देश में सम्मानपूर्वक ब्रिज मैन ऑफ इंडिया का नाम मिला।

उनके द्वारा तैयार किए गए पुलों के डिजाइन बेहद कम बजट में और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध स्वदेशी सामग्रियों के उपयोग से तैयार किए जाते थे जिससे सरकार को बड़े कंक्रीट ढांचे बनाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। इन सस्ते और टिकाऊ पुलों ने विभिन्न राज्यों की सरकारों का करोड़ों रुपया बचाया और ग्रामीण परिवहन को एक बेहद सरल और सुरक्षित विकल्प प्रदान किया। पर्यावरण के अनुकूल बनी इस बेहतरीन तकनीक ने देश के ग्रामीण क्षेत्रों के सामाजिक और आर्थिक विकास में एक बड़ी और ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।

श्रमदान तकनीक

ब्रिज मैन ऑफ इंडिया भारद्वाज के काम की सबसे बड़ी और अनोखी विशेषता यह थी कि वह निर्माण कार्य में स्थानीय ग्रामीणों को पूरी तरह शामिल करते थे। मजदूरों के साथ मिलकर ग्रामीण खुद श्रमदान करते थे जिससे उनमें उस पुल के प्रति जिम्मेदारी और अपनत्व की भावना पैदा होती थी और वे बाद में उसकी बेहतर देखरेख करते थे। समाज के प्रति उनकी इसी निस्वार्थ सेवा और समर्पण को देखते हुए भारत सरकार ने साल दो हजार सत्रह में उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से नवाजा था।

उनकी इसी प्रेरणादायक जीवन यात्रा और सामाजिक कार्यों पर आधारित एक शानदार बायोपिक फिल्म बनाने की घोषणा भी हाल ही में निर्देशक संतोष कोडेंकेरी द्वारा की गई है जिसे हिंदी और कन्नड़ भाषाओं में बड़े पर्दे पर प्रदर्शित किया जाएगा। मैसूर विश्वविद्यालय सहित कई प्रतिष्ठित संस्थानों ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि देकर सम्मानित किया था। उनका जाना भारतीय इंजीनियरिंग जगत और विशेषकर ग्रामीण भारत के लिए एक ऐसा शून्य छोड़ गया है जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। पद्मश्री गिरीश भारद्वाज के सामाजिक कार्यों और उनके जीवन से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों की जानकारी सार्वजनिक रिकॉर्ड्स पर आधारित है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

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