दिल्ली

जस्टिस वर्मा पर तीनों आरोप सिद्ध, अब संसद के रिकॉर्ड में पूरा मामला

जस्टिस वर्मा पर तीनों आरोप सिद्ध, संसद में जांच रिपोर्ट पेश हुई। नकदी, सबूतों से छेड़छाड़ और सफाई पर समिति ने गंभीर सवाल उठाए हैं।

By अजय त्यागी 1 min read
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जस्टिस यशवंत वर्मा

नई दिल्ली, दिल्ली। जस्टिस यशवंत वर्मा पर लगी तीनों शिकायतों को संसदीय जांच समिति ने सही पाया है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की ओर से गठित 3 सदस्यीय समिति की रिपोर्ट बुधवार को संसद के दोनों सदनों में रखी गई। मामला नई दिल्ली स्थित सरकारी आवास के स्टोररूम में मिले जले हुए 500 रुपये के नोटों से जुड़ा है। IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, समिति ने नकदी के स्रोत और मौजूदगी पर संतोषजनक जवाब नहीं मिलने के साथ सबूतों से छेड़छाड़ और सफाई से जुड़े आरोप भी साबित माने हैं। [1]

तीनों आरोप सिद्ध

समिति ने अपनी जांच में कहा कि स्टोररूम में मिली बड़ी मात्रा में नकदी के बारे में जस्टिस वर्मा कोई संतोषजनक हिसाब नहीं दे सके। रिपोर्ट के मुताबिक वह यह स्पष्ट नहीं कर पाए कि पैसा किसका था और वहां कैसे पहुंचा। जांच में नकदी से जुड़े आरोपों के अलावा सबूतों को सुरक्षित रखने के तरीके और उनके जवाब की भी पड़ताल हुई। समिति ने कहा कि उपलब्ध गवाहियों और दूसरे दस्तावेजी साक्ष्यों को देखते हुए तीनों आरोपों का आधार साबित होता है।

रिपोर्ट में आग लगने के बाद स्टोररूम की स्थिति को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। समिति के मुताबिक मौके पर मौजूद अहम सामग्री को ठीक तरह से सुरक्षित नहीं किया गया और कानूनी तरीके से सील कर जांच पूरी होने से पहले जगह की स्थिति बदल गई। जांचकर्ताओं ने इसे महज प्रक्रिया की चूक नहीं माना बल्कि मामले के सबूतों पर असर डालने वाला अहम पहलू बताया। समिति ने इस स्थिति को नकदी मिलने की पूरी घटना और बाद की कार्रवाई समझने में महत्वपूर्ण माना है।

नकदी पर सवाल

जस्टिस वर्मा ने नकदी मिलने को लेकर कई संभावनाएं सामने रखी थीं। इनमें पैसा किसी दूसरे व्यक्ति की ओर से रखा जाना या किसी साजिश के तहत वहां पहुंचाया जाना भी शामिल था। लेकिन समिति ने कहा कि इन दावों को साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री पेश नहीं की गई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि उनकी सफाई स्वतंत्र सरकारी गवाहों के बयान और दूसरे पुष्टिकारक साक्ष्यों के सामने टिक नहीं पाई। समिति ने जवाब को टालमटोल वाला और अपेक्षित पारदर्शिता से दूर माना।

जांच रिपोर्ट में रात करीब 2 बजे कर्मचारियों के साथ हुई बातचीत का भी जिक्र है। समिति ने कहा कि जस्टिस वर्मा ने यह साफ नहीं किया कि उस बातचीत में क्या हुआ और कोई निर्देश दिए गए थे या नहीं। संबंधित कर्मचारियों को उनके बचाव में गवाह के तौर पर भी पेश नहीं किया गया। समिति ने यह भी नोट किया कि नकदी रखे जाने या सबूत से छेड़छाड़ की शिकायत वाली कोई FIR या औपचारिक शिकायत सामने नहीं आई। इन परिस्थितियों को समिति ने उनकी दलीलों के आकलन में अहम माना।

सबूतों पर सवाल

यह जांच पहले हुई आंतरिक पड़ताल के बाद आगे बढ़ी थी। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना के आदेश पर हुई उस जांच में भी कहा गया था कि स्टोररूम पर जस्टिस वर्मा का सक्रिय या मौन नियंत्रण था। विवाद बढ़ने के बाद उन्हें उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद हाई कोर्ट वापस भेजा गया। जुलाई 2025 में 200 से ज्यादा सांसदों ने उनके खिलाफ हटाने की मांग वाला प्रस्ताव दिया था। इसके अगले महीने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 3 सदस्यीय न्यायिक जांच समिति गठित की थी।

समिति ने अपनी रिपोर्ट मई में लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी थी और अब इसे संसद के दोनों सदनों में 2 खंडों के साथ औपचारिक रूप से पेश किया गया है। इनमें जांच के दौरान जुटाए गए मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य शामिल हैं। जस्टिस वर्मा इस्तीफा दे चुके हैं इसलिए उन्हें हटाने की संसदीय प्रक्रिया अब व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी हो गई है। हालांकि उनके इस्तीफे की औपचारिक अधिसूचना कानून मंत्रालय की ओर से अभी बाकी बताई गई है। इसके बावजूद रिपोर्ट ने मामले में समिति का निष्कर्ष दर्ज कर दिया है।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। इसमें जांच समिति की रिपोर्ट में दर्ज निष्कर्षों और उपलब्ध तथ्यों को समाचार शैली में प्रस्तुत किया गया है, इसे किसी न्यायिक निर्णय के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

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