उत्तर प्रदेश

3 नाम ट्रस्ट को जाएंगे, CEO का चयन अब अंतिम फैसले की ओर

CEO का चयन अंतिम दौर में है। 16 उम्मीदवारों के इंटरव्यू पूरे हो चुके हैं। अब 3 नाम ट्रस्ट को भेजे जाएंगे और नए CEO पर अंतिम फैसला होगा।

By अजय त्यागी 1 min read
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राम मंदिर, अयोध्या

अयोध्या, उत्तर प्रदेश। CEO का चयन अब अंतिम चरण में पहुंच गया है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के मुताबिक 11 और 12 अगस्त को अयोध्या स्थित ट्रस्ट परिसर में 16 शॉर्टलिस्ट उम्मीदवारों के अंतिम दौर के इंटरव्यू पूरे किए गए। अब सर्च कमेटी सभी अंतिम उम्मीदवारों का मूल्यांकन करेगी और 3 नामों का पैनल ट्रस्ट को भेजेगी। इसके बाद नए पूर्णकालिक CEO की नियुक्ति पर अंतिम फैसला ट्रस्ट करेगा। यह पद मंदिर के प्रशासन और भविष्य के विकास के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। [1]

अंतिम दौर शुरू

सर्च कमेटी में रिटायर्ड जस्टिस परमोद कोहली, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल वीके चतुर्वेदी और परमाणु वैज्ञानिक डॉ. सुरेश हावरे शामिल हैं। कमेटी ने उम्मीदवारों को प्रबंधन क्षमता, बड़े आयोजनों और कर्मचारियों को संभालने का अनुभव, व्यक्तिगत योग्यता, भाषा दक्षता, विजन और रणनीतिक योजना जैसे मानकों पर परखा। अंतिम चरण तक पहुंचे उम्मीदवारों में सेना के पूर्व अधिकारी, रिटायर्ड IAS और IPS अधिकारी तथा सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्रों से जुड़े अनुभवी पेशेवर शामिल हैं। अब कमेटी अंतिम मूल्यांकन के बाद 3 नामों का पैनल तैयार करेगी।

CEO का चयन कई चरणों की स्क्रीनिंग के बाद इस मुकाम तक पहुंचा है। शुरुआत में 5,585 आवेदन मिले थे, जिनमें से 3,877 उम्मीदवारों ने विस्तृत CV जमा किए। इसके बाद करीब 111 उम्मीदवारों को ऑनलाइन बातचीत के लिए चुना गया। इस चरण में उनकी संवाद क्षमता, पेशेवर अनुभव, विजन, व्यक्तित्व, नेतृत्व क्षमता और तकनीकी समझ का आकलन हुआ। ऑनलाइन मूल्यांकन के बाद 16 उम्मीदवार आमने सामने बातचीत के लिए अयोध्या पहुंचे। अब इन्हीं अंतिम उम्मीदवारों के प्रदर्शन और योग्यता को देखकर 3 नाम ट्रस्ट के पास भेजे जाएंगे।

ट्रस्ट का फैसला

CEO की नियुक्ति 3 साल के अनुबंध पर होगी और संतोषजनक प्रदर्शन के आधार पर इसे आगे बढ़ाया जा सकता है। वेतन और दूसरी सुविधाएं आपसी चर्चा से तय की जाएंगी। नियुक्त अधिकारी सीधे ट्रस्ट की निगरानी में काम करेगा। उसके जिम्मे प्रशासन और भविष्य के विकास की देखरेख होगी। इसके अलावा कानूनी और नियामकीय नियमों का पालन, वित्तीय पारदर्शिता, सरकारी एजेंसियों के साथ सुरक्षा समन्वय और धार्मिक आयोजनों की व्यवस्था भी उसकी जिम्मेदारियों में शामिल होगी। श्रद्धालुओं की सुविधा और महत्वपूर्ण अतिथियों के इंतजाम पर भी उसे नजर रखनी होगी।

इस पद की अहमियत हाल में सामने आए कथित दान गबन मामले के कारण भी बढ़ गई है। मामले में नकदी के कथित हेरफेर और चढ़ावे के प्रबंधन को लेकर आरोप सामने आए थे। जून में FIR दर्ज होने के बाद अब तक कम से कम 8 लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी दी गई है। ऐसे माहौल में CEO का चयन केवल प्रशासनिक नियुक्ति नहीं, बल्कि ट्रस्ट के कामकाज को अधिक व्यवस्थित और जवाबदेह बनाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। हालांकि मामले से जुड़े आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष सक्षम जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।

अगला फैसला

ट्रस्ट के मुताबिक पूरी चयन प्रक्रिया का उद्देश्य राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व वाली संस्था के लिए योग्य नेतृत्व चुनना है। कमेटी ने अंतिम उम्मीदवारों को प्रबंधन, नेतृत्व क्षमता, व्यक्तित्व, विजन, रणनीतिक योजना और तकनीकी विशेषज्ञता के आधार पर परखा है। प्रक्रिया में कई स्तरों की स्क्रीनिंग और मूल्यांकन रखा गया ताकि चयन योग्यता के आधार पर हो। अब सर्च कमेटी 3 नामों का पैनल तैयार करके ट्रस्ट को भेजेगी। इसके बाद ट्रस्ट उम्मीदवारों पर विचार करेगा और पूर्णकालिक CEO की नियुक्ति को लेकर अंतिम घोषणा करेगा।

अंतिम चरण में पहुंची प्रक्रिया के बाद अब सभी की नजर 3 नामों के पैनल और ट्रस्ट के फैसले पर है। नए CEO को मंदिर प्रशासन के साथ वित्तीय पारदर्शिता, सुरक्षा, धार्मिक कार्यक्रमों और श्रद्धालुओं की सुविधाओं जैसे कई अहम मोर्चे संभालने होंगे। इसलिए CEO का चयन ट्रस्ट के लिए एक महत्वपूर्ण संस्थागत फैसला माना जा रहा है। फिलहाल सर्च कमेटी के मूल्यांकन के बाद गेंद ट्रस्ट के पाले में होगी और उसी के फैसले से यह स्पष्ट होगा कि देश के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक संस्थानों में से एक का पहला पूर्णकालिक CEO कौन बनेगा।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। चयन प्रक्रिया और दान से जुड़े मामले की जानकारी उपलब्ध तथ्यों और आधिकारिक बयानों के आधार पर प्रस्तुत की गई है। किसी व्यक्ति या संस्था पर लगाए गए आरोपों को अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जाना चाहिए, जब तक सक्षम प्राधिकारी या न्यायिक प्रक्रिया से उनकी पुष्टि न हो। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

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