80वें स्वाधीनता दिवस पर सभी पाठकों को हार्दिक बधाई, आज सवाल सिर्फ आजादी का नहीं, आत्मनिर्भरता का भी है। क्योंकि उसके बिना आजादी अभी अधूरी है!
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
हम आज 80वां स्वाधीनता दिवस मना रहे हैं। देश के हर कोने में तिरंगा है, हर मंच पर राष्ट्रभक्ति है, हर मोबाइल स्क्रीन पर देशभक्ति के संदेश हैं और हर भाषण में आत्मनिर्भर भारत का उद्घोष है। ऐसा लगता है जैसे भारत ने दुनिया को बता दिया हो कि अब हमें किसी की जरूरत नहीं। बस एक छोटी सी दिक्कत है। भाषण खत्म होते ही हमें याद आता है कि कच्चा तेल बाहर से चाहिए, गैस बाहर से चाहिए, सेमीकंडक्टर बाहर से चाहिए, कई जरूरी इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट बाहर से चाहिए, आधुनिक मशीनें बाहर से चाहिए, रक्षा क्षेत्र की कई महत्वपूर्ण तकनीकें बाहर से चाहिए और दवाइयों के कच्चे माल में भी विदेशी निर्भरता बनी हुई है।
अर्थात् आजादी अभी अधूरी है। यानी हमारा आत्मविश्वास पूरी तरह स्वदेशी है, लेकिन उसकी बैटरी शायद आयातित है।
आजादी का मतलब आखिर है क्या? क्या सिर्फ इतना कि कोई विदेशी हुकूमत हम पर शासन न करे। अगर यही आजादी है तो निश्चित रूप से हम आजाद हैं। लेकिन अगर आजादी का मतलब अपने विचार रखने की स्वतंत्रता, समान अवसर, न्याय, आर्थिक आत्मनिर्भरता, अपने जीवन के फैसले खुद लेने का अधिकार और भय से मुक्त होकर जीना है, तो फिर तस्वीर थोड़ी जटिल हो जाती है।
क्योंकि भूख से परेशान आदमी को संविधान में लिखी स्वतंत्रता जितनी सुंदर दिखाई देती है, उतनी ही महंगी भी लग सकती है।
जिस व्यक्ति के पास दो वक्त के भोजन की चिंता है, जिसके सिर पर कर्ज है, जिसके बच्चे की शिक्षा अधूरी है और जिसे इलाज के लिए अपनी जमीन बेचनी पड़ सकती है, उससे यह कहना कि तुम पूरी तरह स्वतंत्र हो, कुछ वैसा ही है जैसे बिना पेट्रोल की गाड़ी के मालिक को यह समझाना कि तुम्हारे पास दुनिया की सबसे शानदार कार है। अर्थात् आजादी अभी अधूरी है।
राजनीतिक स्वतंत्रता जरूरी है, लेकिन आर्थिक स्वतंत्रता उसके बिना अधूरी है। और आर्थिक स्वतंत्रता केवल बड़े उद्योग लगाने से नहीं आती। वह तब आती है जब हम उन मशीनों, तकनीकों, कल-पुर्जों और कच्चे माल को भी अपने देश में बनाने लगें जिनके सहारे हमारा उद्योग खड़ा है।
हम मोबाइल फोन जोड़ सकते हैं, लेकिन उसके भीतर की कई महत्वपूर्ण चीजें बाहर से आती हैं। हम सौर ऊर्जा के बड़े संयंत्र लगा सकते हैं, लेकिन उसके लिए जरूरी कई महत्वपूर्ण हिस्सों में विदेशी निर्भरता बनी हुई है। हम दुनिया को दवाइयां बेच सकते हैं, लेकिन दवाइयां बनाने के कच्चे माल के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रह सकते हैं।
अर्थात् आजादी अभी अधूरी है। इसे विरोधाभास कहें, विडंबना कहें या आत्मनिर्भरता का भारतीय संस्करण।
हम तैयार माल के मामले में आत्मनिर्भर होने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उसे तैयार करने वाली तकनीक और मशीनों के मामले में अभी भी दूसरों के भरोसे हैं। यानी दुकान अपनी है, सामान अपना है, ग्राहक अपना है, लेकिन दुकान खोलने की मशीन किसी और की है।
रक्षा क्षेत्र में तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है। देश रक्षा उत्पादन में आगे बढ़ रहा है, निर्यात भी बढ़ रहा है, लेकिन आधुनिक युद्ध की असली ताकत केवल टैंक, मिसाइल या विमान की संख्या नहीं होती। उसके पीछे इंजन, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सामग्री विज्ञान और अत्याधुनिक तकनीक होती है। जहां सबसे कठिन तकनीक शुरू होती है, वहीं आत्मनिर्भरता की असली परीक्षा शुरू होती है।
और यहीं हमारा राष्ट्रवादी सीना थोड़ा धीरे फूलता है।
हम दुनिया को यह बताने में बिल्कुल पीछे नहीं रहते कि भारत विश्वगुरु बनने की राह पर है। लेकिन विश्वगुरु बनने के रास्ते में अगर हर कुछ किलोमीटर पर किसी विदेशी तकनीक का टोल टैक्स देना पड़े तो मंजिल तक पहुंचने से पहले जेब जरूर हल्की हो जाएगी।
ऊर्जा के क्षेत्र में स्थिति भी हमें बहुत कुछ सिखाती है। दुनिया में तेल की कीमत बढ़ी तो हमारी अर्थव्यवस्था पर असर। अंतरराष्ट्रीय बाजार में उथल-पुथल हुई तो असर। आपूर्ति में संकट आया तो असर। यानी हमारी ऊर्जा सुरक्षा का एक हिस्सा अभी भी समुद्र पार बैठा हुआ है।
अर्थात् आजादी अभी अधूरी है। इसे आजादी का कौन सा संस्करण कहेंगे। ऐसा संस्करण जिसमें स्वतंत्रता दिवस अपना है लेकिन पेट्रोल की कीमत का मूड अंतरराष्ट्रीय बाजार तय करता है।
फिर आता है सेमीकंडक्टर का युग। आज की दुनिया में चिप केवल मोबाइल में नहीं होती। कार से लेकर एटीएम तक, संचार से लेकर रक्षा तकनीक तक, हर जगह चिप महत्वपूर्ण है। ऐसे में जिस देश की महत्वाकांक्षा डिजिटल महाशक्ति बनने की हो, उसके लिए चिप निर्माण में आत्मनिर्भर होना केवल आर्थिक लक्ष्य नहीं बल्कि रणनीतिक जरूरत है।
हमने इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं। संयंत्र लगाए जा रहे हैं, नीतियां बनाई जा रही हैं, निवेश आ रहा है। लेकिन आत्मनिर्भरता कोई उद्घाटन पट्टिका नहीं है जिसे लगाकर काम पूरा मान लिया जाए। उसके लिए वर्षों तक शोध, कौशल, निवेश, धैर्य और लगातार मेहनत चाहिए।
और शायद सबसे ज्यादा चाहिए वह चीज जिसकी चर्चा भाषणों में सबसे कम होती है, यानी लंबे समय तक एक ही दिशा में काम करने की आदत।
कृषि के मामले में भी कहानी दिलचस्प है। हम गेहूं और चावल में आत्मनिर्भर होने पर गर्व करते हैं, लेकिन खेती को सहारा देने वाले खाद्य तेल, उर्वरक और रसायनों के कुछ हिस्सों में विदेशी निर्भरता बनी हुई है। मतलब किसान खेत में फसल जरूर उगा रहा है, लेकिन फसल उगाने की कई जरूरी चीजों की कीमत और उपलब्धता का फैसला सीमा पार की परिस्थितियां भी प्रभावित कर सकती हैं।
अर्थात् आजादी अभी अधूरी है। यहां भी आत्मनिर्भरता हमें आधी दिखाई देती है और आधी किसी बंदरगाह पर कंटेनर में आती हुई।
लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सरकार नहीं, हम हैं।
किसी भी सरकार से यह उम्मीद करना कि वह रातोंरात भारत को हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना देगी, उतना ही आसान है जितना हर समस्या के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहरा देना। आत्मनिर्भर भारत केवल सरकारी योजना नहीं हो सकता। यह वैज्ञानिक की प्रयोगशाला, इंजीनियर की मेज, किसान का खेत, उद्यमी का कारखाना, विद्यार्थी की मेहनत और विदेश में काम कर रहे भारतीय की जिम्मेदारी से भी बनता है।
यही वह जगह है जहां हमें अपनी आजादी को नए सिरे से समझने की जरूरत है।
विदेश जाना गलत नहीं है। विदेश में काम करना गलत नहीं है। पैसा कमाना भी गलत नहीं है। दुनिया में भारतीय प्रतिभा जहां भी जाए, देश का नाम रोशन करे, इससे अच्छी बात क्या होगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी प्रतिभा का थोड़ा सा हिस्सा उस मिट्टी के लिए भी बचा है जिसने हमें बनाया।
हम अक्सर अंग्रेजी में एक भारी भरकम वाक्य सुनते हैं, Pay back to our society। सोशल मीडिया पर इस पर खूब चर्चा होती है। पोस्ट लिखे जाते हैं, तस्वीरें लगाई जाती हैं, प्रेरक संदेश साझा किए जाते हैं और फिर अगले ही मिनट हम अपनी जिम्मेदारी किसी दूसरे के कंधे पर रखकर आगे बढ़ जाते हैं।
असल चुनौती यही है।
देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए हर व्यक्ति को वैज्ञानिक बनने की जरूरत नहीं है। हर कोई उद्योगपति भी नहीं बन सकता। हर कोई नई तकनीक नहीं बना सकता। लेकिन हर व्यक्ति अपने हिस्से की ईमानदारी, मेहनत, जिम्मेदारी और क्षमता देश को दे सकता है।
एक शिक्षक बेहतर पीढ़ी तैयार कर सकता है। एक इंजीनियर स्वदेशी समाधान विकसित कर सकता है। एक कारोबारी देश में उत्पादन बढ़ा सकता है। एक वैज्ञानिक नई तकनीक विकसित कर सकता है। विदेश में बैठा भारतीय निवेश, ज्ञान और अनुभव वापस ला सकता है। एक पत्रकार सवाल पूछ सकता है और समाज को आईना दिखा सकता है।
और एक नागरिक इतना तो कर ही सकता है कि आजादी को केवल छुट्टी, झंडे और सोशल मीडिया की तस्वीर तक सीमित न रखे।
अर्थात् आजादी अभी अधूरी है। आज हमारे सामने असली सवाल यह नहीं है कि हम आजाद हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि हमारी आजादी कितनी आत्मनिर्भर है।
हमने विदेशी शासन से मुक्ति हासिल कर ली। अब हमें विदेशी निर्भरता के उन हिस्सों से मुक्ति की ओर बढ़ना है जो हमारी अर्थव्यवस्था, तकनीक, ऊर्जा और रणनीतिक क्षमता को कमजोर करते हैं।
क्योंकि असली आजादी वह दिन होगी जब हम दुनिया से जुड़कर भी अपने पैरों पर खड़े होंगे। जब हमें किसी से दुश्मनी करने की जरूरत नहीं होगी, लेकिन किसी के भरोसे जीने की मजबूरी भी नहीं होगी।
तब हम सचमुच कह सकेंगे कि आजादी केवल कैलेंडर की तारीख नहीं है। वह हमारी सोच में है, हमारी तकनीक में है, हमारी अर्थव्यवस्था में है, हमारी क्षमता में है और सबसे बढ़कर हमारी जिम्मेदारी में है।
फिलहाल तो स्थिति यही है कि हम 80वें स्वाधीनता दिवस पर पूरे उत्साह से कह रहे हैं, भारत माता की जय।
और भारत माता शायद मुस्कुराकर पूछ रही हैं।
बेटा, जय तो ठीक है। लेकिन अब जरा अपने पैरों पर खड़े भी हो जाओ।
क्योंकि सही मायने में आजादी अभी अधूरी है। - अजय त्यागी
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