राष्ट्रीय

आरोपियों की पहचान वाली पुलिस पोस्ट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की सोशल मीडिया पोस्ट में आरोपियों की पहचान उजागर करने के मामले में केंद्र राज्यों और Meta तथा X को नोटिस जारी किया।

By अजय त्यागी 1 min read
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प्रतीकात्मक फोटो

नई दिल्ली, दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की सोशल मीडिया पोस्ट में आरोपियों की पहचान उजागर करने के मामले में केंद्र राज्यों और Meta तथा X से जवाब मांगा है। याचिका में पुलिस को ऐसे पोस्ट डालने से रोकने और राज्यों को इसके लिए दिशा निर्देश बनाने की मांग की गई है। PTI की एक रिपोर्ट के अनुसार, याचिका पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची तथा जस्टिस वी मोहना की पीठ ने सुनवाई की और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया। फिलहाल कोर्ट ने कोई अंतिम रोक नहीं लगाई है। [1]

पुलिस पोस्ट पर सवाल

याचिका में कहा गया है कि पुलिस के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से आरोपियों के चेहरे या पहचान उजागर करने वाली सामग्री पोस्ट नहीं की जानी चाहिए। इसमें ऐसे वीडियो और तस्वीरों का भी जिक्र है जिनमें आरोपियों को हथकड़ी लगाए या रस्सियों से बंधे दिखाया जाता है। याचिकाकर्ता ने पुलिस संगठनों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर राज्यों को स्पष्ट दिशा निर्देश बनाने की मांग की है। मकसद यह है कि किसी आरोपी को अपमानजनक या अमानवीय स्थिति में दिखाने वाली सामग्री सार्वजनिक न की जाए।

याचिका में आरोपियों के साथ मारपीट या उन्हें जबरन घुटनों पर बैठाने जैसी तस्वीरों और वीडियो को भी चिंता का विषय बताया गया है। इसमें सीढ़ियों से घसीटने या नीचे खींचने जैसे दृश्यों का उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि पुलिस की सोशल मीडिया गतिविधियों के लिए स्पष्ट नियम होने चाहिए ताकि जांच और कानून व्यवस्था की जानकारी साझा करने के नाम पर किसी व्यक्ति की गरिमा प्रभावित न हो। इसी आधार पर राज्यों से भविष्य में ऐसी सामग्री रोकने के लिए व्यवस्था बनाने की मांग की गई है।

सोशल मीडिया कंपनियों से मांग

याचिका में Meta और X से भी उनके प्लेटफॉर्म के लिए ऐसी नीतियां और यूजर गाइडलाइन बनाने की मांग की गई है जो आरोपियों की पहचान उजागर करने या उन्हें अमानवीय तथा अपमानजनक स्थिति में दिखाने वाली सामग्री पर रोक लगाने में मदद करें। इसके अलावा पहले से पोस्ट की गई ऐसी सामग्री को यूजर की शिकायत मिलने पर हटाने के लिए पारदर्शी और तय प्रक्रिया बनाने की मांग की गई है। मामले में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भी पक्षकार बनाया गया है।

याचिका के मुताबिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किसी आरोपी की पहचान या उसके साथ कथित अमानवीय व्यवहार दिखाने वाली सामग्री सामने आने पर शिकायत के बाद उसे हटाने की प्रक्रिया स्पष्ट और प्रभावी होनी चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी ऐसी सभी पोस्ट हटाने का आदेश दे दिया है। अदालत ने फिलहाल संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है। आगे की सुनवाई में राज्यों और सोशल मीडिया कंपनियों का पक्ष सामने आने के बाद मामले की दिशा स्पष्ट होगी।

कानूनी प्रक्रिया पर नजर

यह मामला पुलिस की सोशल मीडिया गतिविधियों और आरोपियों के अधिकारों से जुड़े सवालों पर केंद्रित है। याचिका में राज्यों को दिशा निर्देश बनाने और सोशल मीडिया कंपनियों को पारदर्शी शिकायत व्यवस्था तैयार करने की मांग की गई है। अदालत ने इन मांगों पर संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। इसलिए अभी इसे किसी नई बाध्यकारी नीति या देशभर में लागू आदेश के रूप में देखना सही नहीं होगा। आरोपियों की पहचान से जुड़े मामलों में आगे अदालत की सुनवाई महत्वपूर्ण रहेगी।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस चरण में संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है और याचिका में उठाई गई मांगों पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

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