खनिजों पर टैक्स को लेकर सरकार ने नया ढांचा पेश किया है। खनन लागत घटाने और स्टील, सीमेंट, बिजली जैसी चीजों की कीमतों पर दबाव कम करने की कोशिश है।
प्रतीकात्मक फोटो
नई दिल्ली, दिल्ली। खनिजों पर टैक्स को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा बदलाव प्रस्तावित किया है। संसद के दोनों सदनों से मंजूर Mines and Minerals Development and Regulation Amendment Bill 2026 का मकसद खनन क्षेत्र के लिए एक समान और संतुलित कर ढांचा बनाना है। IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, बिल के तहत राज्य सरकारें खनिज अधिकारों और खनिज वाली जमीन पर नए टैक्स नहीं लगा सकेंगी, सिवाय उन परिस्थितियों के जिन्हें केंद्र सरकार तय करेगी। सरकार का दावा है कि इससे खनन कारोबार में लागत और अनिश्चितता घटेगी। [1]
सरकार के मुताबिक अभी राज्यों में खनन पर करीब 14 तरह के टैक्स, शुल्क और फीस लगते हैं। इनमें रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम, डेड रेंट, जिला खनिज फाउंडेशन भुगतान, GST और ट्रांजिट फीस शामिल हैं। कुछ राज्यों में खनिज वाली जमीन पर अलग से टैक्स लगाने की शुरुआत भी हुई है और कुछ मामलों में यह दर 20 प्रतिशत तक पहुंची है। सरकार का कहना है कि ऐसे अलग अलग शुल्क से खनिजों की लागत बढ़ती है और पूरे देश में एक समान बाजार बनाने में दिक्कत आती है।
महंगे घरेलू खनिजों का असर सिर्फ खनन कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। सरकार के अनुसार खनन स्तर पर बढ़ी लागत आगे स्टील, सीमेंट, बिजली और निर्माण क्षेत्र तक पहुंचती है। इसका असर आखिरकार घर बनाने और जरूरी सामान खरीदने वाले आम लोगों पर भी पड़ सकता है। वित्त वर्ष 2025 26 में भारत ने 10,12,529 करोड़ रुपये के खनिज आयात किए। सरकार का तर्क है कि घरेलू खनिज महंगे होने पर उद्योग विदेश से कच्चा माल खरीदने लगते हैं और देश की आत्मनिर्भरता की कोशिश कमजोर होती है।
खनिजों पर टैक्स का असर रणनीतिक और महत्वपूर्ण खनिजों पर भी पड़ रहा है। सरकार ने बताया कि ग्रेफाइट जैसे महत्वपूर्ण खनिज और यूरेनियम जैसे परमाणु खनिज भी अलग अलग शुल्क के दायरे में आते हैं। ज्यादा लागत के कारण इनका खनन कई जगह व्यावसायिक रूप से मुश्किल हो सकता है। अलग राज्यों में अलग दरें होने से परियोजनाओं की लागत भी बदल जाती है। ऐसे में सरकार एक समान व्यवस्था के जरिए महत्वपूर्ण खनिज परियोजनाओं को आर्थिक रूप से व्यवहारिक बनाए रखना चाहती है।
सरकार के मुताबिक कोयला क्षेत्र में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 5 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलता है, जबकि गैर कोयला खनन क्षेत्र 1 करोड़ से अधिक लोगों को सहारा देता है। ज्यादा शुल्क के कारण कुछ खदानें बंद हुई हैं और कुछ परियोजनाएं शुरू नहीं हो पाई हैं। छोटे और मध्यम कारोबारी कम मार्जिन पर काम करते हैं, इसलिए बढ़ी लागत का असर उन पर पहले पड़ता है। सरकार का मानना है कि स्थिर कर व्यवस्था से निवेश और रोजगार दोनों को बढ़ावा मिल सकता है।
खनिजों पर टैक्स में स्थिरता का सीधा संबंध निवेश से भी जोड़ा जा रहा है। सरकार के अनुसार खनन में पैसा लगाने वाले निवेशक तभी लंबी अवधि की योजना बनाते हैं, जब टैक्स और शुल्क की व्यवस्था पहले से साफ और अनुमान के मुताबिक हो। अचानक बदलाव निवेश को रोक सकते हैं और नई तकनीक तथा बुनियादी ढांचे पर खर्च धीमा कर सकते हैं। खनिजों की उपलब्धता स्टील, रक्षा, जहाजरानी, निर्माण और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों के लिए अहम है। इसलिए सरकार इसे व्यापक औद्योगिक जरूरत से जोड़ रही है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। खनिजों पर टैक्स और राज्यों की कर व्यवस्था में वास्तविक बदलाव कानून के अंतिम प्रावधानों और केंद्र तथा राज्य सरकारों की अधिसूचनाओं के अनुसार लागू होंगे। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।