ट्रंप का सऊदी परमाणु दांव अब अमेरिकी कांग्रेस तक पहुंचा। नागरिक परमाणु समझौते के साथ इजरायल से रिश्ते सामान्य करने की शर्त शामिल। सऊदी अरब का रुख भी अहम होगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
वॉशिंगटन, अमेरिका। ट्रंप का सऊदी परमाणु दांव अब अमेरिकी कांग्रेस की समीक्षा के दौर में पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने सऊदी अरब के साथ नागरिक परमाणु ऊर्जा समझौता कांग्रेस को भेज दिया है। समझौते के तहत अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब को नागरिक परमाणु तकनीक निर्यात कर सकेंगी। Reuters की एक रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप ने साफ किया है कि यह समझौता तभी आगे बढ़ेगा जब सऊदी अरब इजरायल के साथ संबंध सामान्य करेगा। [1]
समझौते को जुलाई में अंतिम रूप दिया गया था और अब कांग्रेस के पास इसकी समीक्षा के लिए 90 सत्र दिवस हैं। इस अवधि में कांग्रेस ने औपचारिक आपत्ति नहीं जताई तो समझौता लागू हो सकता है। ट्रंप प्रशासन के लिए सऊदी परमाणु दांव सिर्फ परमाणु ऊर्जा से जुड़ा समझौता नहीं बल्कि मध्य पूर्व की कूटनीति में बड़ा कदम भी है। प्रस्ताव में AP1000 रिएक्टरों के निर्माण की योजना है और इससे अमेरिकी कंपनी वेस्टिंगहाउस को बड़ा कारोबारी फायदा मिल सकता है।
ट्रंप ने इस समझौते को इजरायल के साथ सऊदी रिश्ते सामान्य होने से जोड़ दिया है। यह शर्त अब पूरी प्रक्रिया का सबसे अहम राजनीतिक पहलू बन गई है। सऊदी अरब ने इजरायल को मान्यता देने के लिए फिलिस्तीनी राज्य की दिशा में एक अपरिवर्तनीय रास्ते की मांग की है। 2023 में दोनों देशों के बीच सामान्य संबंधों की संभावना बढ़ी थी लेकिन गाजा युद्ध शुरू होने के बाद हालात बदल गए। अब परमाणु समझौते के साथ क्षेत्रीय राजनीति भी जुड़ गई है।
समझौते को लेकर अमेरिकी डेमोक्रेट सांसदों और परमाणु अप्रसार के विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं। उनकी चिंता मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि समझौता सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन या परमाणु कचरे के पुनर्संसाधन से स्पष्ट रूप से नहीं रोकता। आलोचकों के मुताबिक ये दोनों प्रक्रियाएं परमाणु हथियार बनाने की दिशा में संभावित रास्ते बन सकती हैं। इसके विपरीत ट्रंप प्रशासन का कहना है कि समझौते में कानून के तहत जरूरी परमाणु अप्रसार संबंधी सुरक्षा उपाय मौजूद हैं।
ट्रंप का सऊदी परमाणु दांव इसलिए बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि इसमें ऊर्जा कारोबार और मध्य पूर्व की कूटनीति दोनों एक साथ जुड़े हैं। प्रस्तावित समझौता 30 साल का है और इसके तहत अरबों डॉलर की परमाणु परियोजनाएं सामने आ सकती हैं। लेकिन इसकी राह में कांग्रेस की समीक्षा के साथ सऊदी अरब की इजरायल नीति और परमाणु सुरक्षा से जुड़े सवाल भी हैं। फिलहाल यह देखना अहम होगा कि कांग्रेस इस समझौते को किस तरह आगे बढ़ाती है और सऊदी अरब इजरायल संबंधों को लेकर क्या कदम उठाता है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। परमाणु समझौते की अंतिम स्थिति कांग्रेस की समीक्षा और संबंधित सरकारों के आगामी फैसलों पर निर्भर करेगी तथा शर्तों में बदलाव संभव है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।