नेपाल की भीषण आपदा के बाद उत्तराखंड की ग्लेशियल झीलों पर चिंता बढ़ी है। वैज्ञानिकों ने निगरानी और अध्ययन तेज करने की जरूरत बताई है।
उत्तराखंड की एक ग्लेशियल झील
देहरादून, उत्तराखंड। नेपाल में आई भीषण आपदा के बाद उत्तराखंड की ग्लेशियल झीलों को लेकर वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ गई है। राज्य में 1000 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल वाली 426 ऐसी झीलें मौजूद हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इनमें से केवल कुछ संवेदनशील ग्लेशियरों का ही विस्तृत अध्ययन हुआ है। हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से बदलते मौसम और ग्लेशियरों के पीछे हटने के कारण आपदा का खतरा बढ़ रहा है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ की जगह बारिश होना भी इस खतरे को बढ़ाने वाला कारक माना जा रहा है। [1]
उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों से जुड़ी आपदाओं का खतरा नया नहीं है। वर्ष 2013 में केदार घाटी में चौराबाड़ी ग्लेशियल झील की दीवार टूटने के बाद विनाशकारी आपदा आई थी। इसके बाद राज्य और केंद्र सरकारों ने ऐसी झीलों की निगरानी पर विशेष ध्यान दिया। फरवरी 2024 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने हिमालयी क्षेत्रों की झीलों का अध्ययन कर 190 संवेदनशील और अत्यधिक संवेदनशील झीलों की सूची तैयार की। उत्तराखंड की 13 झीलों को भी संवेदनशील श्रेणियों में रखा गया।
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के अध्ययन के अनुसार, उत्तराखंड में करीब 1200 ग्लेशियल झीलें हैं और इनमें केवल 13 को संवेदनशील नहीं माना गया है। वरिष्ठ वैज्ञानिक मनीष मेहता ने बताया कि इसरो के अध्ययन के अनुसार नेपाल में आई अचानक बाढ़ के पीछे बर्फीला हिमस्खलन या मलबे का बहाव संभावित कारण हो सकता है। उपग्रह तस्वीरों में ग्लेशियरों के पीछे हटने और तेजी से पिघलने के संकेत मिले हैं। संकरी घाटी में मलबे या हिमस्खलन से अस्थायी बांध बनने के बाद उसके टूटने की आशंका भी जताई गई है।
वैज्ञानिकों के अनुसार उत्तराखंड और नेपाल के हिमालयी क्षेत्र भौगोलिक परिस्थितियों के लिहाज से काफी समान हैं। इसलिए नेपाल की घटना को उत्तराखंड के लिए भी चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है। मेहता ने कहा कि उपग्रह तस्वीरों के आधार पर आपदा से पहले और बाद की परिस्थितियों का अध्ययन किया जा रहा है। अचानक अत्यधिक बारिश के कारण चट्टानों के टूटने और पानी के साथ नीचे बहने की संभावना की भी जांच हो रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसी घटनाएं हिमालय के किसी भी हिस्से में हो सकती हैं।
वाडिया इंस्टीट्यूट के निदेशक विनीत कुमार गेहलोत ने बताया कि नेपाल आपदा के दौरान तिब्बत में भूकंप जैसी हलचल दर्ज हुई थी। बाद की जांच में भूकंप होने की पुष्टि नहीं हुई और यह संभावना सामने आई कि दर्ज हलचल किसी बड़े भूस्खलन से जुड़ी हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लेशियल झीलों तक पहुंचना बेहद कठिन है, इसलिए दूरस्थ निगरानी और आधुनिक उपकरणों की मदद जरूरी है। उत्तराखंड में झीलों के नए अध्ययन की पहल शुरू की जा रही है, ताकि संभावित नुकसान को कम किया जा सके।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों से जुड़े जोखिमों के आकलन में वैज्ञानिक अध्ययन और नए आंकड़ों के आधार पर बदलाव संभव है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।