डेटा साझाकरण को लेकर नेपाल और चीन के बीच पुरानी चिंता अब हिमालयी तबाही के बाद फिर सामने है। आपदा से पहले चेतावनी और निगरानी व्यवस्था पर नए सवाल उठ रहे हैं।
कीचड़ में दबे मकान
काठमांडू, नेपाल। डेटा साझाकरण को लेकर नेपाल और चीन के बीच मई में हुई बातचीत अब हिमालयी तबाही के बाद बेहद अहम हो गई है। नेपाली अधिकारियों ने ग्लेशियर की शुरुआती हलचल, जलस्तर और अचानक आने वाले खतरों की जानकारी पहले देने की मांग की थी। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, बैठक के बाद नेपाल को अपनी जरूरत के मुताबिक जानकारी नहीं मिल सकी। हालांकि विशेषज्ञों ने साफ किया है कि सूचना की कमी को इस आपदा का सीधा कारण नहीं माना जा सकता। फिर भी भविष्य की चेतावनी व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ गई है। [1]
27 मई को काठमांडू में नेपाल और चीन के अधिकारियों की बैठक हुई थी। इसमें बाढ़, मौसम और ग्लेशियर से जुड़े खतरों की निगरानी पर सहयोग बढ़ाने की चर्चा हुई। नेपाल ने ग्लेशियर झीलों की सूची, खतरे वाले इलाकों की मैपिंग और शुरुआती चेतावनी व्यवस्था मजबूत करने की बात रखी। नेपाली अधिकारियों के मुताबिक उन्हें ग्लेशियर की हलचल और जलस्तर जैसी जानकारी अधिक जल्दी चाहिए थी। चीन की ओर से कहा गया कि मौजूद अधिकारियों के पास समझौते पर हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं था और इस मुद्दे पर आगे बातचीत की जरूरत होगी।
नेपाल की चिंता सिर्फ बारिश के पूर्वानुमान को लेकर नहीं थी। अधिकारियों का कहना है कि चीन से भारी बारिश की जानकारी मिलती रही है लेकिन हिमस्खलन, जलस्तर, भूस्खलन और अचानक होने वाली चरम घटनाओं पर नियमित सूचना सीमित रही। चीन के दूतावास ने दूसरी तरफ कहा कि दोनों देश लगातार संपर्क में हैं और बैठक में सीमा पार आपदा संबंधी जानकारी साझा करने पर ठोस प्रगति हुई थी। दूतावास ने यह भी कहा कि चीनी और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के लिए दूरदराज के हिमालयी इलाकों की निगरानी बड़ी चुनौती है।
आपदा से 12 दिन पहले चीन के विश्व मौसम विज्ञान केंद्र ने नेपाल को ईमेल भेजकर 14 से 19 अगस्त के दौरान भारी बारिश की संभावना बताई थी। संदेश में भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसे खतरों की चेतावनी भी दी गई थी। लेकिन जिस इलाके में ग्लेशियर टूटा वह दूर और सीमित निगरानी वाला क्षेत्र था। विशेषज्ञों के मुताबिक केवल बारिश का अनुमान किसी ग्लेशियर के अचानक टूटने का सटीक पूर्वानुमान नहीं दे सकता। यही वजह है कि भविष्य में डेटा साझाकरण के साथ स्थानीय निगरानी और रियल टाइम चेतावनी व्यवस्था मजबूत करना जरूरी माना जा रहा है।
26 अगस्त को ग्लेशियर का हिस्सा टूटने के बाद बर्फ, चट्टान और मलबे के साथ तेज बाढ़ नीचे की ओर दौड़ी। करीब 168 किलोमीटर तक पहुंचे इस सैलाब ने निगरानी केंद्रों को भी नुकसान पहुंचाया। नेपाली अधिकारियों के मुताबिक सीमा के पास एक निगरानी केंद्र से डेटा आना बंद हो गया और नीचे के कुछ केंद्रों से भी संपर्क टूट गया। इसके बाद स्थानीय अधिकारियों से बाढ़ की पुष्टि की गई और 9:13 बजे मोबाइल फोन पर सार्वजनिक चेतावनी भेजी गई। घटनाक्रम ने दिखाया कि कुछ मिनट की जानकारी भी लोगों को बचाने में निर्णायक हो सकती है।
नेपाल अब चीन के साथ डेटा साझाकरण का ऐसा ढांचा चाहता है जिसमें बारिश के साथ नदी के जलस्तर और दूसरे महत्वपूर्ण संकेतकों की जानकारी भी नियमित रूप से मिले। नेपाली अधिकारियों के मुताबिक प्रस्तावित व्यवस्था में हर 10 मिनट पर डेटा मिलने की उम्मीद है। मकसद साफ है कि खतरे का पता लगते ही नीचे बसे लोगों को चेतावनी दी जा सके। नेपाल की भारत के साथ पहले से मौजूद व्यवस्था को भी इस प्रस्ताव के लिए उदाहरण माना जा रहा है। सीमा पार बहने वाली नदियों के कारण दोनों देशों के बीच ऐसी व्यवस्था का महत्व और बढ़ जाता है।
इस आपदा में करीब 800 लोगों की मौत और 3,000 से ज्यादा लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। बाढ़ और मलबे ने पुलों, सड़कों और बिजली उत्पादन क्षमता को भी नुकसान पहुंचाया। विशेषज्ञों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के पिघलने और बर्फबारी के बदलते पैटर्न से हिमालयी इलाकों में जोखिम बढ़ रहा है। ऐसे में डेटा साझाकरण केवल तकनीकी मुद्दा नहीं रह जाता बल्कि सीधे लोगों की सुरक्षा से जुड़ा सवाल बन जाता है। नेपाल अब भविष्य की किसी भी ऐसी आपदा में चेतावनी चूकने से बचने के लिए चीन के साथ सहयोग बढ़ाना चाहता है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। उपलब्ध विशेषज्ञ आकलनों के अनुसार डेटा साझाकरण की सीमाओं को इस आपदा का प्रत्यक्ष कारण नहीं माना गया है और घटनाक्रम से जुड़े कुछ आंकड़े समय के साथ बदल सकते हैं। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।