बलाई समाज के इतिहास और संस्कृति पर नई पुस्तक। लेखक एच आर मलिण्डा की कृति में समाज की उत्पत्ति, विकास, सामाजिक संरचना, संघर्ष और योगदान को सामने लाने का दावा।
प्रतीकात्मक फोटो
लक्ष्मणगढ़, राजस्थान (शिंभु सिंह शेखावत)। बलाई समाज पर केंद्रित पुस्तक बलाई समाज इतिहास एवं संस्कृति के विमोचन की तैयारी है। लेखक एच आर मलिण्डा सीकर जिले के रुल्याना माली गांव से हैं और वर्तमान में भारत सरकार के राजस्व विभाग में राजपत्रित अधिकारी के रूप में कार्यरत बताए गए हैं। पुस्तक को बुद्धम् पब्लिशर्स जयपुर ने प्रकाशित किया है। इसमें समाज की उत्पत्ति विकास भौगोलिक विस्तार सामाजिक संरचना धार्मिक व्यवस्था आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति तथा समाज सुधार आंदोलनों जैसे विषयों को शामिल किया गया है। यानी इतिहास की अलमारी में जिस हिस्से पर धूल ज्यादा थी वहां अब किताब रखने की कोशिश है।
पुस्तक में संत महापुरुषों समाज सुधारकों के योगदान और राजनीतिक भागीदारी जैसे विषयों पर भी सामग्री होने की जानकारी दी गई है। लेखक ने इसे बलाई समाज के इतिहास सामाजिक संरचना और संघर्षों का शोधपरक अध्ययन बताया है। इसका उद्देश्य आत्मसम्मान सामाजिक पहचान और उपेक्षित इतिहास को सामने लाना बताया गया है। बात दिलचस्प इसलिए भी है क्योंकि समाजों का इतिहास अक्सर बड़े नामों और बड़े घटनाक्रमों के बीच दब जाता है। यह किताब उसी दबे हुए हिस्से को सामने लाने की कोशिश के रूप में पेश की जा रही है और अब पाठकों की नजर इस दावे पर रहेगी कि इसमें इतिहास कितना विस्तार से दर्ज हुआ है।
लेखक ने पुस्तक अपने दादा दादी स्वर्गीय बालूराम मलिण्डा और स्वर्गीय मोहरी देवी को समर्पित की है। विमोचन समारोह में साहित्यकार इतिहासकार शिक्षाविद और समाज के गणमान्य लोगों के शामिल होने की संभावना बताई गई है। कार्यक्रम की तारीख और स्थान की घोषणा बाद में की जाएगी। बलाई समाज के इतिहास को लेकर पुस्तक का सामने आना इसलिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है क्योंकि किसी समुदाय की पहचान केवल वर्तमान उपलब्धियों से नहीं बल्कि उसके अतीत संघर्ष और सामाजिक बदलावों से भी बनती है। अब देखना यह होगा कि किताब के पन्ने समाज की स्मृतियों को कितना मजबूत दस्तावेज बनाते हैं।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। पुस्तक की विषयवस्तु लेखक और प्रकाशक द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के आधार पर प्रस्तुत की गई है और इसमें वर्णित ऐतिहासिक निष्कर्षों की स्वतंत्र अकादमिक पुष्टि का दावा नहीं किया जा रहा है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।