गिद्धों की घटती संख्या ने संरक्षण को लेकर चिंता। तमिलनाडु में दुर्लभ प्रजातियों के सामने दवाओं, भोजन की कमी और आवास से जुड़े खतरे।
गिद्धों का झुण्ड - फाइल फोटो
तमिलनाडु, भारत। इंटरनेशनल वल्चर अवेयरनेस डे के मौके पर तमिलनाडु में गिद्धों की घटती संख्या को लेकर चिंता फिर सामने आई है। राज्य के जंगल दक्षिण भारत में इन संकटग्रस्त पक्षियों के अहम ठिकानों में शामिल हैं। 2026 के राज्यव्यापी रैप्टर सर्वे में 51 शिकारी पक्षी प्रजातियां दर्ज हुईं और पश्चिमी तमिलनाडु के जंगलों में सफेद पीठ वाले, भारतीय और लाल सिर वाले गिद्धों की मौजूदगी मिली। इन तीनों को गंभीर रूप से संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है। [1]
गिद्धों की घटती संख्या के पीछे कई वजहें हैं। पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ दर्द निवारक दवाएं गिद्धों के लिए जानलेवा साबित होती हैं। खास तौर पर डाइक्लोफेनाक को इनके बड़े पैमाने पर पतन की प्रमुख वजह माना गया है। इसके अलावा भोजन की कमी, जहरीले रसायन, मृत पशुओं को दफन करना और बिजली की लाइनों से टकराने या करंट लगने जैसे खतरे भी बने हुए हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक केवल दवा पर रोक लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सुरक्षित भोजन और आवास भी जरूरी हैं।
तमिलनाडु सरकार ने गिद्ध संरक्षण के लिए राज्य स्तरीय समिति बनाई है और पशु उपचार में प्रतिबंधित डाइक्लोफेनाक के इस्तेमाल पर कार्रवाई भी की है। सरकारी दस्तावेज के अनुसार कई निर्माताओं और विक्रेताओं पर कार्रवाई की गई है। जंगलों में पोस्टमार्टम के बाद सुरक्षित शव खुले में छोड़ने और गिद्धों के आवास में पानी की व्यवस्था जैसे कदम भी उठाए गए हैं। इससे संरक्षण की दिशा में प्रयास तो दिखते हैं, लेकिन दवाओं की निगरानी और स्थानीय स्तर पर जागरूकता लगातार बनाए रखना बड़ी चुनौती है।
गिद्धों की घटती संख्या को देखते हुए संरक्षण का दायरा अब जंगलों से आगे गांवों और पशुपालकों तक ले जाने की जरूरत महसूस की जा रही है। 5 सितंबर 2026 को इंटरनेशनल वल्चर अवेयरनेस डे के तहत तमिलनाडु में जागरूकता कार्यक्रम, पशुपालकों के लिए सुरक्षित उपचार संबंधी पहल और गिद्ध संरक्षण समितियों से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसका मकसद स्थानीय लोगों को यह समझाना है कि गिद्ध केवल मृत जीव खाने वाले पक्षी नहीं हैं, बल्कि वे प्रकृति की सफाई व्यवस्था में अहम भूमिका निभाते हैं।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। गिद्धों की संख्या और संरक्षण से जुड़े आंकड़े अलग अलग सर्वेक्षणों तथा समयावधियों के आधार पर बदल सकते हैं और किसी एक आंकड़े को वर्तमान स्थिति का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।