राजस्थान में अब निकाय चुनाव की तस्वीर साफ, 10,245 वार्डों में कुल 38,891 प्रत्याशी मैदान में, भाजपा कांग्रेस पर बागियों का दबाव और हर वार्ड में कड़ा मुकाबला।
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
जयपुर, राजस्थान। सिंबल आवंटन के साथ राजस्थान में निकाय चुनाव की तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई है। नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद 10,245 वार्डों में 38,891 प्रत्याशी मैदान में हैं। इससे भाजपा और कांग्रेस के सामने सिर्फ विरोधी दल नहीं बल्कि अपने ही खेमे से निकले बागी और निर्दलीय उम्मीदवार भी बड़ी चुनौती बन गए हैं। 309 नगरीय निकायों में होने वाला यह मुकाबला अब प्रचार से आगे संगठन की ताकत और स्थानीय पकड़ की सीधी परीक्षा बन गया है। [1]
नामांकन प्रक्रिया के दौरान 69,811 नामांकन पत्र दाखिल हुए थे। जांच में 17,137 नामांकन खारिज हुए और 10,112 प्रत्याशियों ने नाम वापस ले लिए। इसके बाद 38,891 उम्मीदवार मैदान में बचे हैं। चुनाव चिन्ह मिलने के साथ प्रत्याशियों की पहचान मतपत्र पर तय हो गई है और अब प्रचार अभियान तेज होगा। राज्य में 309 नगरीय निकायों के 10,245 वार्डों में यह मुकाबला होना है। ऐसे में हर वार्ड का स्थानीय समीकरण दोनों बड़े दलों के लिए अहम माना जा रहा है।
इस बार कई वार्डों में मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं रहेगा। टिकट से नाराज होकर निर्दलीय मैदान में उतरे दावेदार और दूसरे दलों के प्रत्याशी वोटों का गणित बदल सकते हैं। 77 प्रत्याशी निर्विरोध चुने जा चुके हैं जिससे कुछ वार्डों में मुकाबला मतदान से पहले ही खत्म हो गया। बाकी सीटों पर अब उम्मीदवार घर घर संपर्क और बूथ स्तर की तैयारी में जुटेंगे। निकाय चुनाव में जीत का अंतर कई बार छोटा रहता है इसलिए बागी उम्मीदवारों की मौजूदगी अहम हो सकती है।
टिकट वितरण के बाद दोनों प्रमुख दलों में असंतोष की खबरें सामने आईं। कांग्रेस ने नाराज दावेदारों को मनाने के लिए स्थानीय नेताओं और वरिष्ठ पदाधिकारियों को सक्रिय किया। भाजपा में भी टिकट चयन को लेकर कुछ जगह असहमति और विरोध की स्थिति बनी। कई दावेदारों ने पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के सामने निर्दलीय चुनाव लड़ने का रास्ता चुना। ऐसे में दोनों दलों की सबसे बड़ी चुनौती अपने कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना और यह सुनिश्चित करना है कि असंतोष मतदान के दिन वोटों में तब्दील न हो।
नाम वापसी के आखिरी दौर में कई जगह सियासी खींचतान भी देखने को मिली। कुछ उम्मीदवारों के नाम वापस लेने को लेकर दबाव और प्रलोभन के आरोप सामने आए जबकि कुछ जगह कार्यकर्ताओं के बीच विवाद की स्थिति बनी। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि हर मामले में नहीं हुई है इसलिए इन्हें आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। इतना जरूर साफ है कि टिकट और समर्थन को लेकर अंदरूनी खींचतान ने भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए निकाय चुनाव को आसान मुकाबला नहीं रहने दिया है।
अब मुकाबला प्रचार और जनसंपर्क के दौर में पहुंच चुका है। भाजपा मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के रोड शो और संगठन के बूथ स्तर के नेटवर्क के सहारे माहौल बनाने में जुटी है। कांग्रेस का जोर स्थानीय नेतृत्व और वार्ड से जुड़े मुद्दों पर है। सड़क सफाई पानी स्ट्रीट लाइट और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे मतदाताओं के बीच अहम रहेंगे। दोनों दलों के लिए यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शहरी इलाकों का जनादेश उनके संगठन और स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता का संकेत दे सकता है।
मतदान 9 सितंबर और 11 सितंबर को दो चरणों में होना है जबकि मतगणना 14 सितंबर को होगी। इसके बाद महापौर सभापति और चेयरमैन जैसे पदों के लिए अगली चुनावी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। यानी मौजूदा मुकाबला सिर्फ पार्षद चुनने तक सीमित नहीं है बल्कि आगे बनने वाले शहरी नेतृत्व की जमीन भी तैयार करेगा। निकाय चुनाव में अब असली कसौटी यह होगी कि भाजपा और कांग्रेस अपने संगठन को कितना एकजुट रख पाती हैं और बागियों की चुनौती के बीच मतदाताओं का भरोसा किसे मिलता है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
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