खाद्य सुरक्षा अभियान तेज होने के साथ खाने पर सख्ती बढ़ी है। पैक्ड फूड पर चेतावनी लेबल की तैयारी ने कंपनियों और उपभोक्ताओं दोनों का ध्यान खींच लिया है।
प्रतीकात्मक फोटो
नई दिल्ली, दिल्ली। खाने पर सख्ती अब देशभर में तेजी पकड़ रही है। खाद्य सुरक्षा अधिकारियों ने रेस्तरां और खाद्य कारोबारों की जांच बढ़ा दी है। Reuters की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2020 से हर साल 100000 से ज्यादा खाद्य नमूनों की जांच हुई और करीब 20 प्रतिशत नमूने असुरक्षित, घटिया या सही लेबल के बिना पाए गए। पिछले 3 साल में करीब 8000 खाद्य कारोबार लाइसेंस रद्द किए गए हैं। यह कार्रवाई मिलावट और खराब स्वच्छता पर लगाम लगाने की बड़ी कोशिश मानी जा रही है। [1]
खाने पर सख्ती का असर अब छोटे कारोबारों के साथ बड़े ब्रांड और रेस्तरां तक भी दिख रहा है। हाल की एक कार्रवाई में अधिकारियों ने 1300 किलो मिलावटी पनीर जब्त किया। महाराष्ट्र में खाद्य आयुक्त तुकाराम मुंढे की अचानक जांच भी लगातार चर्चा में है। उनकी टीम ने बड़े रेस्तरां और दूसरे प्रतिष्ठानों की जांच की है। एक गोदाम की कार्रवाई में PepsiCo, Nestle, Coca Cola और Unilever के उत्पादों पर कथित तौर पर गलत एक्सपायरी और पोषण संबंधी लेबल मिलने का मामला भी सामने आया।
खाने पर सख्ती के बीच सरकार अब सिर्फ छापों तक सीमित नहीं रहना चाहती। पैक्ड फूड के सामने चेतावनी दिखाने की योजना पर भी काम चल रहा है। FSSAI ने ऐसे उत्पादों के लिए लाल रंग के षट्भुज चिन्ह का प्रस्ताव रखा है जिनमें चीनी, नमक या संतृप्त वसा में से कम से कम 2 पोषक तत्व तय सीमा से ज्यादा हों। मकसद यह है कि ग्राहक पैकेट खोलने या खरीदने से पहले ही समझ सके कि किसी उत्पाद में स्वास्थ्य के लिहाज से ज्यादा जोखिम वाला पोषण स्तर मौजूद है।
खाने पर सख्ती से जुड़ा सबसे बड़ा विवाद अब चेतावनी लेबल को लेकर है। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का कहना है कि 2 पोषक तत्वों की शर्त से ऐसा रास्ता बन सकता है जिसमें केवल चीनी या केवल नमक की अधिक मात्रा वाला उत्पाद चेतावनी से बच जाए। दूसरी तरफ खाद्य उद्योग का तर्क है कि प्रस्तावित सीमाएं बहुत कड़ी हैं और बड़ी संख्या में पैक्ड उत्पादों पर लाल निशान लग सकता है। इस खींचतान ने भारत के 100 अरब डॉलर से ज्यादा के पैकेज्ड फूड कारोबार पर भी दबाव बढ़ाया है।
मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है और 10 सितंबर को प्रस्तावित चेतावनी व्यवस्था पर सुनवाई होनी है। सरकार और नियामक इसे उपभोक्ताओं को ज्यादा स्पष्ट जानकारी देने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं जबकि स्वास्थ्य कार्यकर्ता इसे और मजबूत बनाने की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर कंपनियां बिक्री और उत्पादों की छवि पर संभावित असर को लेकर चिंतित हैं। ऐसे में खाने पर सख्ती आने वाले दिनों में सिर्फ छापों का मुद्दा नहीं रहेगी बल्कि खाद्य कारोबार और उपभोक्ता अधिकारों के बीच बड़ी बहस का केंद्र बन सकती है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। खाद्य सुरक्षा नियमों और चेतावनी लेबल से जुड़ी प्रस्तावित व्यवस्था में बदलाव संभव है और अंतिम नियम संबंधित प्राधिकरणों तथा न्यायिक प्रक्रिया के निर्णय पर निर्भर करेंगे। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।