उत्तर प्रदेश

आजादी और राष्ट्र निर्माण में समर्पित महान नेता पंडित गोविंद बल्लभ पंत

पंडित गोविंद बल्लभ पंत एक महान स्वतंत्रता सेनानी और देश के पहले गृह मंत्री के रूप में याद रखे जाते हैं जिन्होंने आधुनिक भारत की नींव मजबूत की थी।

By अजय त्यागी 1 min read
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प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

टीम Rex TV India की तरफ से भावभीनी श्रृद्धांजली 

अलमोड़ा, उत्तराखंड। पंडित गोविंद बल्लभ पंत आधुनिक भारत के उन महान निर्माताओं में से एक हैं जिन्होंने देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से कड़ा संघर्ष किया और स्वतंत्रता के बाद एक सशक्त राष्ट्र की नींव रखी। उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री और देश के कुशल गृह मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल भारतीय इतिहास का स्वर्ण काल माना जाता है। देश के प्रति उनकी निस्वार्थ सेवा के लिए उन्हें साल 1957 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा गया था ताकि उनके अद्वितीय योगदान को हमेशा के लिए याद रखा जा सके और आने वाली पीढ़ियां उससे लगातार प्रेरणा प्राप्त करती रहें।

शुरुआती जीवन

उनका जन्म 10 सितंबर 1887 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के खूंट गांव में एक बेहद प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम मनोरथ पंत था जो अपने क्षेत्र में काफी जाने-माने और सम्मानित व्यक्ति माने जाते थे। अपनी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय स्तर पर पूरी करने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और कानून की कठिन पढ़ाई को शीर्ष अंकों के साथ सफलतापूर्वक पूरा किया।

कानून की डिग्री प्राप्त करने के बाद पंत ने उत्तराखंड के काशीपुर शहर में अपनी वकालत की प्रैक्टिस की शुरुआत की। उन्होंने वकालत को केवल धन कमाने का जरिया कभी नहीं बनाया बल्कि वे हमेशा गरीब किसानों और राष्ट्रवादियों के मुकदमे पूरी तरह मुफ्त में लड़ते थे जिन्हें ब्रिटिश शासन प्रणाली द्वारा लगातार प्रताड़ित किया जाता था और अन्याय का लगातार शिकार बनाया जाता था ताकि उन्हें उचित कानूनी न्याय मिल सके।

स्वतंत्रता संग्राम

वे महात्मा गांधी की सत्य और अहिंसा वाली विचारधारा से बेहद गहरे रूप में प्रभावित थे और जल्द ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मुख्यधारा की राजनीति में पूरी तरह सक्रिय हो गए। साल 1925 में हुए ऐतिहासिक काकोरी कांड के दौरान उन्होंने क्रांतिकारियों का कानूनी मोर्चे पर बहुत मजबूती से बचाव किया और अदालत में उनकी प्रभावशाली पैरवी की ताकि उन्हें विदेशी हुकूमत के अन्याय से बचाया जा सके और न्याय मिल सके।

साल 1928 में जब पूरे देश में साइमन कमीशन का विरोध करने के लिए एक विशाल प्रदर्शन आयोजित किया गया तो पंत जवाहरलाल नेहरू के साथ आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में खड़े थे। प्रदर्शनकारियों पर हुए लाठीचार्ज के दौरान वे नेहरू की ढाल बनकर खड़े रहे जिससे उनकी रीढ़ की हड्डी पर गंभीर चोट आई और वे जीवनभर कभी सीधे खड़े नहीं हो सके।

मुख्यमंत्री काल

आजादी मिलने से पहले साल 1946 में और उसके बाद साल 1950 में वे संयुक्त प्रांत यानी आधुनिक उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री के रूप में चुने गए। उनके यशस्वी मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान जमींदारी उन्मूलन अधिनियम को सबसे क्रांतिकारी सामाजिक कदम माना जाता है जिसके तहत उन्होंने सदियों पुरानी शोषक प्रथा को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।

इस अत्यंत ऐतिहासिक निर्णय से राज्य के लाखों भूमिहीन किसानों को उनकी अपनी जमीन का पक्का मालिकाना हक प्राप्त हुआ। उन्होंने समाज में महिलाओं के समान अधिकार और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण सरकारी योजनाएं शुरू कीं जो आज भी देश भर में ग्रामीण विकास और महिला सशक्तिकरण का एक बहुत बड़ा मील का पत्थर साबित होती हैं।

गृह मंत्री पद

साल 1955 में देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में भारत का नया गृह मंत्री नियुक्त किया। महान स्वतंत्रता सेनानी सरदार वल्लभभाई पटेल के बाद इस अत्यंत महत्वपूर्ण पद को संभालने वाले वे देश के सबसे प्रभावशाली नेता साबित हुए जिन्होंने देश की आंतरिक सुरक्षा को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता दी।

साल 1956 में उन्होंने देश में राज्य पुनर्गठन अधिनियम को सफलतापूर्वक लागू करवाया जिससे भारत में भाषा के आधार पर नए राज्यों का गठन पूरी तरह शांतिपूर्वक संभव हो सका। इसके अलावा उन्होंने देश की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने और प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए कई कड़े फैसले लिए।

भाषा सुधार

पंत जी संसद की आधिकारिक राजभाषा समिति के सम्मानित और बेहद अनुभवी अध्यक्ष थे। उन्होंने देश की अखंडता और एकता को हमेशा बनाए रखने के लिए हिंदी को आधिकारिक प्रशासनिक भाषा बनाने के वास्ते कई ऐतिहासिक और अथक प्रयास किए ताकि पूरा राष्ट्र एक मजबूत सूत्र में बंध सके और प्रशासनिक संवाद बहुत ही आसान हो जाए।

हालांकि देश के गैर-हिंदी भाषी राज्यों की भावनाओं का पूरा और गहरा सम्मान करते हुए उन्होंने अंग्रेजी को भी सहायक भाषा के रूप में एक लंबी अवधि तक बनाए रखने का बेहद संतुलित फॉर्मूला निकाला। उनकी इसी अद्भुत दूरदर्शिता के कारण देश में किसी भी प्रकार का भाषाई टकराव नहीं हुआ और हमारी राष्ट्रीय अखंडता हमेशा सुरक्षित रही।

अंतिम समय

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय राजनीति के किसी भी बड़े संकट के समय हमेशा उनकी अनुभवी सलाह लेते थे और उन्हें कांग्रेस पार्टी का सबसे बड़ा संकटमोचक मानते थे। उनके इसी अत्यंत दृढ़ और विशाल व्यक्तित्व के कारण उन्हें देश प्रेमियों द्वारा हिमालय पुत्र की अनूठी उपाधि से सम्मानित किया गया था जो आज भी लोगों को उनकी याद दिलाती है।

साल 1961 में 7 मार्च को देश के गृह मंत्री के पद पर पूरी निष्ठा और ईमानदारी से कार्य करते हुए अचानक दिल का दौरा पड़ने से इस महान नेता का निधन हो गया। आज भी दिल्ली में उनकी भव्य प्रतिमा और देश के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय राष्ट्र निर्माण में उनके द्वारा छोड़ी गई महान विरासत की याद दिलाते हैं।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। प्रस्तुत लेख किसी भी राजनीतिक या ऐतिहासिक विवाद को बढ़ावा नहीं देता है बल्कि एक महान व्यक्तित्व के जीवन को उजागर करता है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

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