ईरानी राष्ट्रपति 8 साल बाद भारत पहुंचे हैं। मोदी से मुलाकात में पश्चिम एशिया संकट, युद्ध और BRICS में ईरान की मांग पर अहम चर्चा होगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन - फाइल
नई दिल्ली, दिल्ली। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन शुक्रवार को 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने भारत पहुंच रहे हैं। 8 साल बाद किसी ईरानी राष्ट्रपति की यह भारत यात्रा ऐसे वक्त हो रही है जब पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर है। TNN की एक रिपोर्ट के अनुसार, पेजेश्कियन भारत पहुंचने के बाद BRICS बिजनेस फोरम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और दूसरे नेताओं के साथ शामिल होंगे। इसके बाद शाम को मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक होगी। इस मुलाकात पर दोनों देशों के रिश्तों के साथ क्षेत्रीय संकट को लेकर भी दुनिया की नजर है। [1]
ईरान की कोशिश है कि भारत पश्चिम एशिया में जारी युद्ध को खत्म कराने के लिए अपनी कूटनीतिक भूमिका बढ़ाए। ईरानी राष्ट्रपति की यात्रा के दौरान तेहरान की तरफ से BRICS की प्रस्तावित संयुक्त घोषणा में ईरान के खिलाफ कथित अवैध आक्रमण की कड़ी निंदा की मांग उठ सकती है। भारत के सामने हालांकि सभी सदस्य देशों को साथ लेकर चलने की चुनौती है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी इस संकट से जुड़े अहम पक्ष हैं। बैठक में सऊदी अरब के विदेश मंत्री फैसल बिन फरहान अल सऊद और UAE के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मौजूदगी से मामला और संवेदनशील हो सकता है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऐसी संयुक्त घोषणा तैयार करना है जिस पर BRICS के सभी सदस्य सहमत हों। SCO के बिश्केक घोषणापत्र में भारत ने ईरान पर हमलों की निंदा का समर्थन किया था लेकिन अमेरिका या इजरायल का नाम नहीं लिया गया था। BRICS में UAE की मौजूदगी के कारण इस बार स्थिति अलग हो सकती है। UAE ईरानी हमलों की स्पष्ट निंदा की मांग कर सकता है। ऐसे में भारत बातचीत और कूटनीति को समाधान का रास्ता बताते हुए संयुक्त राष्ट्र चार्टर, समुद्री आवाजाही की स्वतंत्रता और नागरिकों की सुरक्षा जैसे व्यापक मुद्दों पर जोर दे सकता है।
ईरानी राष्ट्रपति की मोदी से मुलाकात सिर्फ द्विपक्षीय रिश्तों तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि BRICS की सामूहिक राजनीति पर भी असर डाल सकती है। भारत इस समय BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और 18वां शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होना है। इससे पहले BRICS के विदेश मंत्रियों की बैठक भी संयुक्त बयान पर सहमति के बिना खत्म हुई थी। ईरान पश्चिम एशिया के घटनाक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर समर्थन चाहता है। वहीं भारत के लिए ईरान के साथ संबंधों के साथ सऊदी अरब और UAE जैसे साझेदारों के साथ संतुलन बनाए रखना भी अहम है।
ऐसे माहौल में ईरानी राष्ट्रपति की भारत यात्रा मोदी सरकार के सामने कूटनीतिक संतुलन की बड़ी परीक्षा है। भारत एक तरफ ईरान की चिंताओं को सुन सकता है तो दूसरी तरफ किसी एक पक्ष के समर्थन की छवि से बचने की कोशिश करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही बातचीत और कूटनीति के जरिए तनाव कम करने पर जोर देते रहे हैं। भारत की प्राथमिकता समुद्री रास्तों की सुरक्षा, आम नागरिकों की रक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर साझा सहमति बनाने की हो सकती है। यही वजह है कि पेजेश्कियन और मोदी की बैठक पर BRICS से आगे भी दुनिया की नजर टिकी हुई है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। पश्चिम एशिया संघर्ष और संबंधित देशों के रुख में बदलाव संभव है इसलिए पाठकों को किसी भी निष्कर्ष से पहले ताजा आधिकारिक जानकारी की पुष्टि करनी चाहिए। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।