मिट्टी के गणेश इस बार गणेशोत्सव को पर्यावरण संरक्षण और राजस्थान की पारंपरिक कला से जोड़ेंगे। आकृति कला संस्थान ने करीब 800 प्रतिमाएं तैयार कराई हैं।
मिट्टी के गणेश
भीलवाड़ा, राजस्थान (पंकज पोरवाल)। मिट्टी के गणेश इस बार शहर में गणेशोत्सव की आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी लेकर आएंगे। आकृति कला संस्थान ने प्राकृतिक मिट्टी से करीब 800 गणेश प्रतिमाएं तैयार कराई हैं। इन प्रतिमाओं में राजस्थान की पारंपरिक मोलेला मिट्टी कला की झलक दिखाई देगी। संस्थान के सचिव कैलाश पालिया के अनुसार प्रतिमाओं का निर्माण खमनोर क्षेत्र की प्रसिद्ध प्राकृतिक मोलेला मिट्टी से कराया गया है। विख्यात लोक कलाकार नारायण लाल कुम्हार ने पारंपरिक कला और शिल्प तकनीक से इन्हें आकार दिया है। 14 सितंबर को श्रद्धालु वकील कॉलोनी स्थित आकृति आर्ट गैलरी से प्रतिमाएं प्राप्त कर सकेंगे।
मिट्टी के गणेश अलग अलग आकार में तैयार कराए गए हैं ताकि श्रद्धालुओं को अपनी जरूरत के अनुसार प्रतिमा मिल सके। संस्थान के अनुसार 6 इंच से लेकर 2 फीट तक की प्रतिमाएं उपलब्ध रहेंगी। आकृति कला संस्थान पिछले 8 वर्षों से इको फ्रेंडली गणेश प्रतिमाओं के जरिए पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहा है। संस्थान का कहना है कि पीओपी प्रतिमाओं के विसर्जन से जल स्रोतों और जलीय जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। प्राकृतिक मिट्टी की प्रतिमाएं विसर्जन के बाद पानी में घुलकर प्रकृति में वापस मिल जाती हैं। इसी वजह से मिट्टी के गणेश को पर्यावरण के लिहाज से बेहतर विकल्प के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है।
इस पहल में मिट्टी के गणेश के साथ राजस्थान की पारंपरिक मोलेला कला और कुम्हार समुदाय के हुनर को भी आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। संस्थान का उद्देश्य कलाकारों की पारंपरिक कला को सम्मान देने के साथ उन्हें आर्थिक बाजार उपलब्ध कराना भी है। आयोजन को सफल बनाने में युवा कलाकार अनु प्रजापत, अनुष्का पाराशर, शांतिलाल गाडरी और उमंग उपाध्याय सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। संस्थान की पहल आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने पर केंद्रित है। इसके जरिए लोगों को यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि उत्सव की खुशियों के साथ प्रकृति की जिम्मेदारी निभाना भी जरूरी है।
14 सितंबर को श्रद्धालु वकील कॉलोनी स्थित आकृति आर्ट गैलरी से मिट्टी के गणेश प्राप्त कर सकेंगे। संस्थान ने शहरवासियों से पीओपी मुक्त गणेशोत्सव मनाने की अपील की है। आयोजकों ने लोगों से मिट्टी से बने गणेश और प्रकृति के संग गणेश उत्सव मनाने का संकल्प लेने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि पर्यावरण संरक्षण में छोटे छोटे कदम भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। प्राकृतिक मिट्टी की प्रतिमाओं को अपनाकर श्रद्धालु धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा सकते हैं। साथ ही इससे पारंपरिक कलाकारों और स्थानीय शिल्प को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
मिट्टी के गणेश की यह पहल करीब 800 प्रतिमाओं के जरिए पर्यावरण और लोककला दोनों को केंद्र में ला रही है। संस्थान पिछले 8 वर्षों से इस दिशा में काम कर रहा है और इस बार भी श्रद्धालुओं को प्राकृतिक विकल्प उपलब्ध कराया गया है। प्रतिमाओं में मोलेला कला की पारंपरिक छाप स्थानीय हुनर को सामने लाएगी। संस्थान की अपील है कि गणेशोत्सव को केवल पूजा और उत्सव तक सीमित न रखते हुए प्रकृति से जुड़ने का अवसर भी बनाया जाए। मिट्टी के गणेश अपनाकर शहरवासी पीओपी मुक्त उत्सव का संदेश दे सकते हैं और पर्यावरण संरक्षण के साथ पारंपरिक कला को भी अपना समर्थन दे सकते हैं।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। प्रतिमाओं के पर्यावरणीय प्रभाव संबंधी जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए दी गई है और विसर्जन के दौरान स्थानीय प्रशासन एवं संबंधित पर्यावरणीय दिशा निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।