ईवीएम में बंद जनता का फैसला अब 14 सितंबर को सामने आएगा। इससे पहले महापौर की कुर्सी के लिए भाजपा और कांग्रेस ने संभावित पार्षदों को साधने की कवायद तेज कर दी है।
प्रतीकात्मक फोटो
भीलवाड़ा, राजस्थान (पंकज पोरवाल)। शहर की जनता ने अपना फैसला ईवीएम में बंद कर दिया है, लेकिन नगर निगम की सत्ता को लेकर सियासी हलचल थमी नहीं है। मतदान खत्म होते ही महापौर की कुर्सी को लेकर पर्दे के पीछे की राजनीति तेज हो गई है। भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने संभावित पार्षदों और वार्डवार समीकरणों का आकलन करने में जुटे हैं। करीबी मुकाबलों वाले वार्डों पर खास नजर है। 70 वार्डों के नतीजे आने से पहले ही यह समझने की कोशिश हो रही है कि किस दल को कितनी सीटें मिल सकती हैं और निर्दलीयों की संख्या कितनी रहेगी। 14 सितंबर को मतगणना के बाद ही तस्वीर साफ होगी।
महापौर की कुर्सी का रास्ता इस बार केवल भाजपा और कांग्रेस की सीटों से तय होता नजर नहीं आ रहा है। निर्दलीय प्रत्याशियों की बड़ी संख्या ने दोनों दलों के समीकरणों को उलझा दिया है। कुल 154 निर्दलीय प्रत्याशियों के मैदान में होने से कई वार्डों में मुकाबला त्रिकोणीय और बहुकोणीय बना। अब निगाह इस बात पर है कि इनमें से कितने प्रत्याशी जीतकर निगम पहुंचते हैं। यदि किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो निर्दलीय पार्षदों की अहमियत अचानक बढ़ सकती है। यही वजह है कि परिणाम से पहले ही संभावित विजेताओं से संपर्क साधने और समर्थन के समीकरण तलाशने की चर्चा तेज है।
भाजपा के संभावित पार्षदों को जयपुर भेजे जाने के बाद बाड़ेबंदी की चर्चा और तेज हो गई है। दूसरी ओर कांग्रेस भी अपने संभावित विजेताओं को लेकर रणनीति बनाने में जुटी है। रिसॉर्ट में पार्षदों को साथ रखने की कवायद को इसी सियासी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। दोनों दल स्थानीय नेताओं और प्रत्याशियों से लगातार फीडबैक ले रहे हैं। वार्डवार आंकड़ों और जीत की संभावनाओं का मिलान किया जा रहा है। महापौर की कुर्सी के चुनाव में पार्षदों की भूमिका निर्णायक होने के कारण राजनीतिक दल अपने खेमे को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हैं। अंतिम परिणाम आने तक यह सियासी कवायद जारी रहने की संभावना है।
महापौर की कुर्सी के लिए सबसे बड़ा सवाल बहुमत के आंकड़े को लेकर है। अगर किसी दल को स्पष्ट बहुमत मिल जाता है तो सत्ता की राह अपेक्षाकृत आसान होगी। लेकिन सीटों का आंकड़ा बहुमत से नीचे रहने पर निर्दलीय पार्षदों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। करीबी मुकाबलों वाले वार्डों के परिणाम भी पूरे समीकरण को बदल सकते हैं। राजनीतिक दल इसीलिए संभावित जीत और हार के आंकड़ों पर लगातार मंथन कर रहे हैं। चुनाव मैदान में वोटों की लड़ाई भले खत्म हो गई हो, लेकिन निगम की सत्ता के लिए असली जोड़तोड़ का दौर अब शुरू माना जा रहा है।
मतगणना के साथ जनता का फैसला सामने आ जाएगा, लेकिन महापौर की कुर्सी किसके हिस्से आएगी, इसका अंतिम जवाब केवल सीटों की संख्या से नहीं मिलेगा। पार्षदों को साथ रखना, समर्थन जुटाना और संभावित बागियों को साधना भी बड़ी चुनौती होगी। 14 सितंबर को ईवीएम खुलने के बाद यह स्पष्ट होगा कि भाजपा या कांग्रेस में से किसे बढ़त मिली और निर्दलीयों की ताकत कितनी रही। अगर किसी एक दल को बहुमत नहीं मिला तो सत्ता की चाबी निर्दलीयों के हाथ में जा सकती है। ऐसे में महापौर की कुर्सी तक पहुंचने के लिए चुनाव जीतने के साथ सियासी समीकरण साधना भी जरूरी होगा।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट उपलब्ध तथ्यों और राजनीतिक घटनाक्रम से संबंधित जानकारी पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। चुनाव परिणाम और महापौर पद के अंतिम समीकरण मतगणना तथा बाद की आधिकारिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होंगे। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।