बड़ा सियासी उलटफेर, जोधपुर में भाजपा कांग्रेस की कड़ी टक्कर और जैसलमेर में बदले समीकरण ने निकाय चुनाव के बाद नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रतीकात्मक फोटो
जोधपुर/जैसलमेर, राजस्थान। राजस्थान के जोधपुर संभाग में निकाय चुनाव के नतीजों ने भाजपा कांग्रेस और दूसरे दलों के सामने नई राजनीतिक तस्वीर रख दी है। जोधपुर नगर निगम में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला बेहद करीबी रहा जबकि जैसलमेर नगर परिषद में भी दोनों दलों के बीच सीधी टक्कर ने सबका ध्यान खींचा। पोकरण में भी मुकाबला नजदीकी रहा। ऐसे में पूरे संभाग के परिणामों को एक साथ देखें तो स्थानीय राजनीति में बड़ा सियासी उलटफेर दिखाई देता है और आगे बोर्ड गठन की प्रक्रिया काफी अहम होगी। [1]
जोधपुर नगर निगम के 100 वार्डों में भाजपा और कांग्रेस के बीच बेहद कड़ा मुकाबला सामने आया। उपलब्ध परिणामों के अनुसार दोनों दलों के 44 44 प्रत्याशी विजयी घोषित किए गए हैं जबकि अन्य दलों के 11 प्रत्याशियों ने भी जीत दर्ज की है। मतगणना 14 सितंबर को हुई। इतने करीबी आंकड़े ने नगर निगम की अगली सत्ता को लेकर उत्सुकता बढ़ा दी है। अब केवल सबसे ज्यादा सीट जीतने की बात नहीं बल्कि आगे बनने वाले समर्थन के समीकरण भी महत्वपूर्ण हो गए हैं।
जोधपुर में बराबरी जैसी स्थिति ने भाजपा और कांग्रेस दोनों की चिंता बढ़ा दी है। दोनों दलों के लिए अब अपने जीते हुए पार्षदों को साथ रखना और आगे की रणनीति तय करना अहम होगा। चुनाव परिणाम आने के बाद महापौर पद का चुनाव अगला बड़ा पड़ाव रहेगा। छोटे दलों और अन्य विजयी उम्मीदवारों की भूमिका भी परिस्थितियों के हिसाब से महत्वपूर्ण हो सकती है। यही बड़ा सियासी उलटफेर है कि इतने बड़े नगर निगम में दोनों प्रमुख दलों के बीच स्पष्ट दूरी दिखाई नहीं दी और सत्ता का रास्ता आगे की प्रक्रिया से तय होगा।
जैसलमेर नगर परिषद में कुल 45 वार्ड हैं और चुनाव परिणामों ने यहां भी भाजपा कांग्रेस के बीच मुकाबले को चर्चा में ला दिया है। चुनाव से पहले दोनों दलों ने सभी प्रमुख वार्डों में पूरी ताकत लगाई थी। वार्ड 23 में कांग्रेस प्रत्याशी के निर्विरोध चुने जाने से मतदान से पहले ही एक सीट का समीकरण बदल गया था। इस बार जैसलमेर में पुराने चुनावी आंकड़ों और नए नतीजों की तुलना भी खास महत्व रखती है क्योंकि पिछले चुनाव में दोनों बड़े दलों के बीच अंतर बेहद कम रहा था।
पिछले निकाय चुनाव में भाजपा 21 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी रही थी जबकि कांग्रेस को 20 और निर्दलीयों को 4 सीटें मिली थीं। इसके बावजूद भाजपा सभापति की कुर्सी हासिल नहीं कर सकी थी और कांग्रेस के बागी उम्मीदवार ने बाजी मार ली थी। इसी पुराने अनुभव के कारण इस बार जैसलमेर में बोर्ड गठन को लेकर राजनीतिक रणनीति पर खास नजर रहेगी। बड़ा सियासी उलटफेर केवल सीटों के आंकड़े से नहीं बल्कि इस बात से भी जुड़ा है कि जीत के बाद कौन अपने पार्षदों को एकजुट रख पाता है।
जैसलमेर जिले की पोकरण नगरपालिका में कुल 25 वार्ड हैं। चुनाव के लिए 17,675 मतदाता सूची में दर्ज थे और मतदान 11 सितंबर को कराया गया था। मतगणना 14 सितंबर को हुई। पोकरण का चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि यह जैसलमेर नगर परिषद से अलग स्थानीय राजनीतिक तस्वीर पेश करता है। जिले के दोनों शहरी निकायों में मतदाताओं का रुख एक जैसा रहे यह जरूरी नहीं है और इसी वजह से बड़ा सियासी उलटफेर हुआ और पोकरण के नतीजों को जैसलमेर के परिणामों के साथ जोड़कर देखना राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पोकरण में वार्ड स्तर पर भाजपा कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच मुकाबला दिखाई दिया। शुरुआती परिणामों में अलग अलग वार्डों में तीनों पक्षों की जीत सामने आई। इसका मतलब साफ है कि स्थानीय उम्मीदवारों की पकड़ और क्षेत्रीय मुद्दे भी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। जैसलमेर जिले में एक तरफ नगर परिषद का मुकाबला और दूसरी तरफ पोकरण की अलग तस्वीर सामने आने से भाजपा और कांग्रेस दोनों को स्थानीय स्तर पर अपनी रणनीति पर दोबारा नजर डालनी होगी। यहां भी बोर्ड गठन का अगला चरण खास नजर आएगा।
जोधपुर संभाग की चुनावी तस्वीर केवल जोधपुर और जैसलमेर तक सीमित नहीं है। पाली नगर निगम में कांग्रेस 29 वार्डों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी जबकि भाजपा को 21 और निर्दलीयों को 15 सीटें मिलीं। बाड़मेर नगर परिषद में भी 55 वार्डों का चुनाव हुआ और दोनों प्रमुख दलों के साथ निर्दलीयों की भूमिका चर्चा में रही। चुनाव से पहले ही वहां दोनों दलों ने संभावित राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए अपने प्रत्याशियों को साथ रखने की रणनीति अपनाई थी।
पूरे संभाग के नतीजों को साथ रखकर देखें तो बड़ा सियासी उलटफेर एक ही रंग में नहीं बल्कि अलग अलग रूप में सामने आया है। जोधपुर में भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला है, जैसलमेर में पुराने समीकरणों के बीच नई तस्वीर बनने की कोशिश है और पोकरण ने भी अलग स्थानीय रुझान दिखाया है। पाली और बाड़मेर जैसे निकायों में निर्दलीयों की मौजूदगी ने तस्वीर और जटिल की है। अब महापौर, सभापति और अध्यक्ष पद के चुनाव बताएंगे कि वार्डों की जीत आखिर स्थानीय सत्ता में किसके पक्ष में बदलती है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। निकाय चुनाव के परिणामों में आधिकारिक अपडेट, संशोधन या आगे होने वाली बोर्ड गठन प्रक्रिया के कारण राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। अंतिम स्थिति के लिए राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़ों को प्राथमिक माना जाना चाहिए। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।