भाजपा की बंपर जीत ने भीलवाड़ा नगर निगम की सियासत का गणित पूरी तरह बदल दिया है। 70 वार्डों के नतीजों में भाजपा ने 45 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया।
प्रतीकात्मक फोटो
भीलवाड़ा, राजस्थान (पंकज पोरवाल)। नगर निगम चुनाव के नतीजों ने शहर की राजनीति में भाजपा का दबदबा और मजबूत कर दिया है। मतगणना के बाद सामने आई तस्वीर में भाजपा ने 45 सीटों के साथ साफ बहुमत हासिल कर लिया, जबकि कांग्रेस को केवल 10 वार्डों में जीत मिली और 15 निर्दलीय प्रत्याशियों ने भी बाजी मारी। चुनाव से पहले टिकट वितरण को लेकर असंतोष, निर्दलीयों की मौजूदगी और कांग्रेस के संगठनात्मक विवाद ने मुकाबले को रोचक बनाया था। लेकिन ईवीएम खुलने के बाद तस्वीर तेजी से भाजपा के पक्ष में जाती दिखी। भाजपा की बंपर जीत के बाद कार्यकर्ताओं ने जश्न मनाया और अब निगम की अगली सत्ता को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है।
इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा उन वार्डों की रही जहां पुराने और मजबूत राजनीतिक चेहरों को चुनौती मिली। दिए गए चुनावी विवरण के मुताबिक कांग्रेस के पूर्व सभापति ओम नराणीवाल की पत्नी लीला नराणीवाल, शहर जिला अध्यक्ष जीपी खटीक की पत्नी समदु देवी, उनके भाई उमेश खटीक, पूर्व सभापति मंजू पोखरणा और पूर्व नेता प्रतिपक्ष धर्मेंद्र पारीक जैसे चर्चित चेहरों को हार का सामना करना पड़ा। भाजपा खेमे के भी कुछ प्रमुख नाम चुनाव नहीं जीत सके। इससे साफ संकेत मिला कि मतदाताओं ने कई जगह पार्टी से ज्यादा स्थानीय उम्मीदवार और अपने वार्ड के समीकरण को महत्व दिया।
मंजू पोखरणा के लंबे समय से प्रभाव वाले क्षेत्र में बदलाव को भी इस चुनाव का बड़ा संकेत माना जा रहा है। युवा प्रत्याशियों ने कई पुराने राजनीतिक चेहरों को कड़ी चुनौती दी और कुछ मुकाबलों में दिग्गजों को शिकस्त भी दी। यही वजह है कि चुनाव परिणाम को केवल भाजपा और कांग्रेस की सीटों के आंकड़े के तौर पर नहीं देखा जा रहा। स्थानीय मुद्दे, व्यक्तिगत जनाधार और नए चेहरों की स्वीकार्यता ने भी नतीजों पर असर डाला। भाजपा की बंपर जीत के साथ शहर की राजनीति में नई पीढ़ी के नेताओं के उभरने की चर्चा भी तेज हो गई है।
चुनाव से पहले 15 निर्दलीय पार्षदों को बोर्ड गठन में संभावित किंगमेकर माना जा रहा था। माना जा रहा था कि भाजपा और कांग्रेस के बीच करीबी मुकाबला हुआ तो इनका समर्थन सत्ता की चाबी तय कर सकता है। लेकिन भाजपा को 45 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद निर्दलीयों की वह भूमिका खत्म हो गई जिसकी चुनाव से पहले चर्चा थी। हालांकि 15 निर्दलीयों की जीत यह जरूर बताती है कि कई वार्डों में स्थानीय समीकरणों और व्यक्तिगत जनाधार ने दोनों बड़े दलों के चुनावी गणित को चुनौती दी।
कांग्रेस के लिए हार की वजहों में संगठनात्मक खींचतान भी बड़ा मुद्दा बनकर सामने आई। दिए गए तथ्यों के अनुसार 17 वार्डों में नामांकन के अंतिम समय तक पार्टी अपने प्रत्याशियों को सिंबल नहीं दे सकी और रिटर्निंग अधिकारी के पास सिंबल जमा नहीं होने से नकारात्मक संदेश गया। चुनाव से पहले भी कांग्रेस के 53 वार्डों में ही अधिकृत प्रत्याशी मैदान में होने की जानकारी सामने आई थी। नतीजों में पार्टी के केवल 10 सीटों तक सिमटने के बाद अब संगठन के भीतर हार की वजहों और आगे की रणनीति पर सवाल उठना तय है।
भाजपा की बंपर जीत के बाद अब सबसे बड़ा सवाल महापौर के चेहरे को लेकर है। महापौर पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित होने के कारण भाजपा के भीतर संभावित दावेदारों को लेकर चर्चा तेज होना तय माना जा रहा है। 45 पार्षदों के मजबूत आंकड़े के चलते बोर्ड गठन में भाजपा को किसी बाहरी समर्थन की जरूरत नहीं होगी। ऐसे में पार्टी के सामने अब चुनौती जीत को सत्ता में बदलने की है। महिला पार्षदों में से किस चेहरे पर नेतृत्व भरोसा जताता है, इसको लेकर आने वाले दिनों में अंदरूनी सियासी गतिविधियां बढ़ने की संभावना है।
चुनाव परिणाम में एक दिलचस्प तस्वीर पति पत्नी की जीत के रूप में भी सामने आई। रमेश खोईवाल और उनकी पत्नी प्रेम देवी खटीक ने अपने अपने वार्ड से चुनाव जीतकर सफलता हासिल की। वहीं 15 निर्दलीयों की जीत ने स्थानीय राजनीति की ताकत को भी सामने रखा। अब निगाहें नई परिषद के गठन और महापौर के चयन पर हैं। भाजपा की बंपर जीत के बाद शहर की जनता की उम्मीदें भी बढ़ी हैं और असली परीक्षा अब निगम के कामकाज, वार्डों के विकास और स्थानीय समस्याओं के समाधान को लेकर होगी।
अस्वीकरण (Disclaimer):
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