संपादकीय

ये जो पब्लिक है ये सब जानती है, जड़ों को जमाना है तो मंथन करना होगा

राजस्थान में हाल में संपन्न निकाय चुनाव के नतीजों ने बता दिया कि बीकानेर के संकरे गलियारों से जयपुर की चौड़ी सड़कों तक ये जो पब्लिक है ये सब जानती है।

By अजय त्यागी 1 min read
Twitter Facebook WhatsApp

प्रतीकात्मक फोटो

पुराने जमाने के महान पार्श्वगायक ने उस समय माइक पर फूँक मारकर जो अमर सत्य फूंका था—‘ये जो पब्लिक है, ये सब जानती है…’  राजस्थान में हुए इन निकाय चुनावों ने दिखा दिया कि वाकई में क्या पब्लिक है भाई! हमारे रणनीतिकार तो उसे लाउडस्पीकर का कानफोडू शोर समझकर भूल गए। इन्हें लगता है कि पब्लिक का धर्म केवल पाँच साल में एक बार धूप में तपकर ईवीएम पर उंगली घिसना है और बाकी 1824 दिन हम जो एसी कमरों में बैठकर चमत्कार करेंगे उन ‘चमत्कारों’ पर जयकारे लगाना है।

लेकिन जब राजस्थान के मरुस्थल और महानगर—बीकानेर के संकरे गलियारों से लेकर गुलाबी नगरी जयपुर की चौड़ाइयों तक—वोटों की मशीनें बोलती हैं तो  दिग्गजों के संगमरमरी महल के पाए हिलते हैं, तब अचानक याद आता है कि अरे! ये जो पब्लिक है ये सब जानती है।

जयपुर का ‘गुलाबी’ भ्रम और बीकानेर की ‘रेत’ का हिसाब

जयपुर के पॉश इलाकों से लेकर पुराने शहर के तंग वार्डों तक, जब सत्ता के प्रबंधकों ने एक्सेल शीट पर जीत के कसीदे गढ़े, तो उन्हें लगा कि हर चौपड़ पर कमल की खुशबू स्थायी पट्टा करा चुकी है। पर धरातल के आंकड़े क्या कहते हैं?

जयपुर निगम क्षेत्र: जहाँ कई वार्डों में जीत-हार का मार्जिन 50 से 150 वोटों के बीच सिमट गया, वहाँ यह जीत किसी सुनामी की नहीं, बल्कि 'कम बुरा विकल्प चुनने की मजबूरी' का प्रमाण थी। जब 40% से ज्यादा मतदाता खामोश रहे या बागी के पाले में खड़े मिले, तो राजाजी यह मानकर बैठ गए कि जनता हमारी मुट्ठी में है—जबकि हकीकत यह थी कि मुट्ठी की रेत फिसल रही थी।

बीकानेर का मरुस्थलीय मिजाज: बीकानेर में विकास के हसीन विज्ञापनों के बीच जब वार्डवार पारदर्शी बक्से खुले, तो स्थानीय क्षत्रपों को अहसास हुआ कि यहां का मतदाता ऊंट की तरह रुख बदलता है। जिन वार्डों में टिकट वितरण का ‘रुपहला-खेल’ चला, वहां बागी उम्मीदवारों ने अधिकृत प्रत्याशियों की जमानत के साथ-साथ अहंकार के गुब्बारे की हवा तक निकाल दी। हार-जीत का अंतर इतना पतला था कि एक नुक्कड़ की चाय की दुकान का ओपिनियन पोल भी रणनीतिकारों के भारी-भरकम सर्वे पर भारी पड़ गया। क्योकि! ये जो पब्लिक है ये सब जानती है।

चाटुकारिता या भाई-भतीजावाद में बंटे टिकट खड़े करते हैं बागियों को

टिकट वितरण की वह पवित्र प्रयोगशाला, जहाँ धरातल के सिपाही को दरकिनार कर ‘साहब के खास’ या ‘कुर्सी के रिश्तेदार’ को परोसा जाता है, असल में वही बागियों की जन्मस्थली होती है।

 जब वर्षों से झंडा ढोने वाले कार्यकर्ता की छाती पर बूट रखकर किसी ‘साझा-सांस्कृतिक-रिश्तेदार’ को सिंबल थमाया जाता है, तो पार्टी दफ्तर के बाहर विरोध नहीं, वैचारिक विद्रोह का ज्वालामुखी फूटता है।

पब्लिक देखती है कि योग्यता की फाइल कूड़ेदान में गई और ‘वफादारी के सर्टीफिकेट’ (जो चाटुकारिता की स्याही से लिखे गए थे) की लॉटरी निकल पड़ी। ऐसे में जब मोहल्ले का उपेक्षित कार्यकर्ता निर्दलीय पर्चा भरकर मैदान में उतरता है, तो जनता उसे बागी नहीं मानती—जनता उसे उस भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के खिलाफ ‘अंतिम शंखनाद’ मानती है।

जयपुर के सँकरे रास्तों से लेकर बीकानेर की किसी ड्योढ़ी तक, जहाँ-जहाँ अपनों को नवाजने का खेल हुआ, वहाँ बागियों ने अधिकृत रथ का पहिया ही जाम कर दिया। पार्टी जिसे 'भीतरघात' कहती है, वह असल में पारदर्शी अयोग्यता पर जनता और कार्यकर्ता का संयुक्त दंडात्मक ब्याज होता है। क्योंकि! ये जो पब्लिक है ये सब जानती है।

भीतरघात का नाम ‘आंतरिक कलह’ या जनता की खुली अदालत?

पार्टी कार्यालय के अंदरूनी ‘पोस्टमार्टम हॉल’ में गंभीर चेहरों वाले रणनीतिकार जयपुर से बीकानेर तक चीख-चीखकर फरमान जारी करते हैं—“हमें अपनों ने डसा है, यह भीतरघात था।”

वाह! क्या गजब की डिक्शनरी है। जनता या मोहल्ले का बागी अगर आपके थोपे हुए उम्मीदवार को कूड़ेदान में फेंक दे, तो वह ‘भीतरघात’ है; और आप जनता को नापसंद आ जाएं, तो वह ‘लंबे समय का लोकतांत्रिक उतार-चढ़ाव’ है। जयपुर की कॉलोनियों से लेकर बीकानेर के पुराने मोहल्लों तक, जिसे आप भीतरघात कह रहे हैं, वह दरअसल पब्लिक के सब्र के उस बाँध का टूटना है जिसमें सीवरेज का गंदा पानी और भाई-भतीजों के नखरे ओवरफ्लो हो चुके थे।

जब बागी, निर्दलीय या मोहल्ले का सामान्य बेटा मैदान में उतरता है और लोग उस पर मुहर लगाते हैं, तो वह सिर्फ बागी प्रेम नहीं होता—वह ऊपर से थोपी गई तानाशाही टिकट-बांटने वाली संस्कृति के मुँह पर तमाचा होता है। पब्लिक ने आईना सामने रख दिया है—आईना एकदम साफ है, बस आपके चेहरे के मेकअप की एक्सपायरी डेट कल ही निकल चुकी है। क्योंकि! ये जो पब्लिक है ये सब जानती है।

कड़वा सच: 45% मतदान, 100% अहंकार और 500% भ्रम

राजनीति अब जमीन की नहीं, एक्सेल शीट के ‘मैनेजमेंट’ की हो गई है। जमीन पर गंध आती है, वहाँ प्यासे कंठ पानी पूछते हैं, स्ट्रीट लाइट फ्यूज होने पर पार्षद का नंबर स्विच ऑफ मिलता है। ऐसे में यदि आप केवल जयपुर-बीकानेर के होर्डिंग्स की चमक, एआई जेनरेटेड वीडियो और पेड एल्गोरिदम पर किला फतह करना चाहेंगे, तो राजस्थान की मिट्टी आपको बता देगी कि किले की दीवारें चाहे जितनी ऊँची हों, अगर नींव (जड़) में दीमक लग चुकी है, तो पहली ही तेज आंधी में मुकुट धूल में होगा।

आंकड़े चिल्लाते हैं—‘हमने बहुसंख्यर निकायों में बढ़त बनाई!’ अरे भाई, जरा उस बढ़त का सूक्ष्म एक्सरे तो कीजिए कि जयपुर और बीकानेर के उन वार्डों में जीत का अंतर कितने वोटों का था? कई वार्डों में जीत का अंतर उतना ही था, जितने मोहल्ले में उम्मीदवार के करीबी रिश्तेदार और उनके  .... वोटर कार्ड रहे होंगे।

मंथन का मतलब यह नहीं होता कि एसी हॉल में बैठकर हार के 50 बहाने खोजे जाएं और प्रेस कॉन्फ्रेंस में घिसा-पिटा जुमला उछाला जाए—‘हम जनादेश का सम्मान करते हैं…’—जबकि भीतर से कलेजा कांप रहा होता है कि अगली बार ये जनता ककड़ी की तरह वजन तौल लेगी। क्योंकि! ये जो पब्लिक है ये सब जानती है।

निष्कर्ष: अंकों के फेर में मत उलझिए, नब्ज देखिए

अंत में, सबक लोहे पर लकीर जैसा साफ है। ‘ये जो पब्लिक है’ वह भूली नहीं है। जयपुर के म्युनिसिपल गणित से लेकर बीकानेर के रेत के धोरों तक, जनता ने हिसाब बराबर कर दिया है। वह माफ कर सकती है, पर यह नहीं भूलती कि चुनाव से पहले वादे क्या थे और चुनाव जीतने के बाद दर्शन दुर्लभ क्यों हो गए।

यदि जड़े जमाए रखनी हैं, तो विज्ञापनों के डिजिटल शोर से बाहर निकलिए, चिलचिलाती दोपहरी में जयपुर के किसी परकोटे की थड़ी या बीकानेर की किसी संकरी गली के नुक्कड़ पर बैठकर कड़क चाय की चुस्की के साथ जनता का असल 'पोल सर्वे' खुद कीजिए! वरना, हर बार परिणाम आएंगे और समीक्षा के नाम पर वही रटा-रटाया विलाप करना पड़ेगा।

जड़ें मिट्टी में होती हैं, और मिट्टी का मिजाज बागी हो जाए तो दरख्त उखड़ते देर नहीं लगती। मंथन कीजिए, वरना पब्लिक अगली बार ईवीएम का ऐसा बटन दबाएगी कि कैलकुलेटर भी एरर (Error) बोल जाएगा। क्योंकि! ये जो पब्लिक है ये सब जानती है। -अजय त्यागी 

अस्वीकरण (Disclaimer):

प्रस्तुत आलेख संपादकीय विश्लेष्ण है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। इसमें दिए गए विचार लेखक के अपने स्वतंत्र विचार हैं, किसी अन्य का इनसे सहमत होना कोई आवश्यक नहीं है। इसके आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

#Bikaner #Rajasthan #RajasthanPolitics #MunicipalElection #BJP #Congress #NagarNigam #RajasthanNews #BikanerNews
Read Full Article on RexTV India