मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय में यौन उत्पीड़न के आरोपों की आंतरिक जांच रिपोर्ट दबाने का बड़ा मामला सामने आया है।
प्रतीकात्मक फोटो
हैदराबाद, तेलंगाना। मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय (MANUU) में आंतरिक अनुशासन और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील मामला सामने आया है। संस्थान के इस्लामिक स्टडीज विभाग के एक वरिष्ठ संकाय सदस्य पर यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगे हैं। इस मामले में पीड़ित सहायक प्रोफेसर ने 23 जनवरी 2026 को आंतरिक शिकायत समिति (ICC) के समक्ष औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी, जिसके बाद महीनों चली जांच के बाद अप्रैल 2026 में समिति ने अपनी रिपोर्ट विश्वविद्यालय प्रशासन को सौंपी थी। [1]
आंतरिक शिकायत समिति ने अपनी गहन जांच के बाद प्रशासन को सौंपी गई रिपोर्ट में आरोपी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की स्पष्ट सिफारिश की थी। पोश अधिनियम (POSH Act) के नियमों के अनुसार नियोक्ता की यह कानूनी जिम्मेदारी होती है कि वह रिपोर्ट मिलने के 60 दिनों के भीतर उसकी प्रतियां दोनों पक्षों को सौंपे और सिफारिशों पर अमल करे। हालांकि, विश्वविद्यालय प्रशासन ने न तो रिपोर्ट की कॉपी दी और न ही समयानुसार कोई ठोस कार्रवाई की, जिससे प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
शिकायतकर्ता महिला प्रोफेसर का आरोप है कि उन्हें लंबे समय तक मानसिक प्रताड़ना, मनोवैज्ञानिक दबाव और शोषण का सामना करना पड़ा। जब उन्होंने आरटीआई (RTI) के माध्यम से जानकारी मांगी तब जाकर उन्हें इस बात का पता चला कि ICC अपनी जांच रिपोर्ट प्रशासन को सौंप चुकी है। इस प्रकार लगातार सामने आ रहे यौन उत्पीड़न के मामलों को सार्वजनिक न करके कथित तौर पर दबाए जाने के कारण छात्र संगठनों और अकादमिक हलकों में भारी रोष व्याप्त हो गया है। जानकारों का कहना है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में ऐसे मामलों को दबाने से पीड़ितों का न्याय व्यवस्था से भरोसा कम होता है।
विवाद बढ़ने और विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा कोई संतोषजनक कदम न उठाए जाने पर पीड़ित ने न्याय के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस मामले में आंतरिक समिति की रिपोर्ट पर कार्रवाई करने के बजाय एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को नया जांच अधिकारी नियुक्त कर दिया, जिसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। अदालत ने अंतरिम आदेश देते हुए विश्वविद्यालय की इन नई जांच कार्यवाही पर रोक लगा दी है। वहीं, विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार एसके इश्तिक अहमद ने मामला उप न्यायनिर्णय (sub judice) होने का हवाला देते हुए इस पर आधिकारिक टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद देश भर के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में महिलाओं की कार्यस्थल पर सुरक्षा और आंतरिक समितियों (ICC) की स्वायत्तता को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ गई है। उच्च न्यायालय के आगामी निर्देशों और सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं ताकि यह तय किया जा सके कि संस्थान POSH अधिनियम के नियमों का पूरी तरह पालन करते हुए निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करते हैं या नहीं। शिक्षाविदों और महिला अधिकारों के जानकारों का मानना है कि यौन उत्पीड़न जैसे संवेदनशील मामलों में प्रशासनिक लापरवाही को रोकने के लिए सख्त और पारदर्शी वैधानिक प्रावधानों का कड़ाई से लागू होना अनिवार्य है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध तथ्यों और सूचनाओं पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। शैक्षणिक संस्थानों और प्रशासनिक मामलों से जुड़े कानूनी फैसले लेने से पहले पाठकों को अपने स्तर पर आधिकारिक स्रोतों की जानकारी अवश्य लेनी चाहिए। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे