शहबाज शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से एक बार फिर कश्मीर का पुराना राग अलापा, जिस पर वहां मौजूद लोगों के बीच हंसी गूँज उठी।
महासभा में शहबाज शरीफ और भारतीय राजनयिक
न्यू यॉर्क। वैश्विक कूटनीति के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित मंच से इस वक्त एक बेहद दिलचस्प और तीखी खबर सामने आ रही है, जो भारत और पाकिस्तान के संबंधों से जुड़ी हुई है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र के दौरान शहबाज शरीफ ने अपने संबोधन में एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय गलियारों में नई चर्चा को जन्म दे दिया है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने अपने भाषण के दौरान पुराने और घिसे-पिटे बयानों को दोहराते हुए एक बार फिर कश्मीर मुद्दे को हवा देने की कोशिश की, जिसे वहां मौजूद राजनयिकों ने पूरी तरह खारिज कर दिया है। [1]
अपने इस संबोधन के दौरान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने पिछले साल यानी 2025 के दौरान भारत के साथ हुए सैन्य संघर्ष का विशेष रूप से उल्लेख किया। शहबाज शरीफ ने अपने भाषण में अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा किए गए कथित समय पर हस्तक्षेप और मध्यस्थता की खुलेआम प्रशंसा की। उनका यह तर्क था कि अमेरिका के कूटनीतिक प्रयासों की वजह से ही उस समय बड़े पैमाने पर होने वाले विनाश को टाला जा सका था। हालांकि, भारत सरकार ने हमेशा से किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के दावों को सिरे से खारिज किया है और यह स्पष्ट किया है कि नियंत्रण से जुड़े सभी मामले द्विपक्षीय बातचीत के जरिए ही हल होते हैं।
हमेशा की तरह इस बार भी संयुक्त राष्ट्र के मंच का इस्तेमाल करते हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कश्मीर का पुराना और बेबुनियाद राग अलापना जारी रखा। शहबाज शरीफ ने क्षेत्रीय शांति की दुहाई देते हुए अपने संबोधन में एक बार फिर आंतरिक मामलों पर अनावश्यक टिप्पणियां कीं, जिससे उनकी मंशा पर सवाल उठने लाजिमी हैं। वैश्विक मंचों पर बार-बार इस प्रकार के निराधार मुद्दों को उठाना पाकिस्तान की पुरानी कूटनीतिक आदत बन चुकी है, जिसका भारत द्वारा हमेशा से कड़ा और दो टूक जवाब दिया जाता रहा है। इस तरह के बयानों से यह साफ हो जाता है कि पड़ोसी देश अपनी घरेलू असफलताओं से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाता है।
मंच पर जब पाकिस्तानी प्रधानमंत्री अपनी पुरानी दलीलें पेश कर रहे थे, तब वहां मौजूद भारतीय राजनयिकों और अधिकारियों के बीच उनकी बातों पर तीखी प्रतिक्रिया और अविश्वास साफ तौर पर देखा गया। शहबाज शरीफ के दावों की खोखली सच्चाई को भांपते हुए भारतीय प्रतिनिधिमंडल के चेहरों पर तीखी हंसी और सहज उपेक्षा का भाव साफ झलकता नजर आया। भारत ने हमेशा यह साबित किया है कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते हैं, और जब तक पाकिस्तान अपनी सरजमीं से संचालित होने वाली आतंकी गतिविधियों पर पूरी तरह लगाम नहीं लगाता, तब तक किसी भी सार्थक संवाद की उम्मीद करना पूरी तरह से बेमानी है।
अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का यह स्पष्ट रूप से मानना है कि पाकिस्तान खुद आतंकवाद का केंद्र है और वैश्विक मंचों पर शांति का ढोंग करना उसका दोहरा चरित्र दिखाता है। शहबाज शरीफ ने अपने भाषण में क्षेत्रीय स्थिरता और विकास की बड़ी-बड़ी बातें तो की गईं, लेकिन सीमा पार से होने वाले आतंकवाद पर पूरी तरह से चुप्पी साध ली गई। दुनिया के तमाम देश अब इस बात को अच्छी तरह समझ चुके हैं कि पाकिस्तान अपने गिरेबान में झांकने के बजाय हमेशा दूसरों पर उंगली उठाने की पुरानी राजनीति करता आया है। वैश्विक समुदाय के बीच अब पाकिस्तान के इन झूठे और बनावटी बयानों का कोई खास असर नहीं पड़ता है, बल्कि उसकी किरकिरी ही होती है।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव और अधिक गहराने की आशंका जताई जा रही है, क्योंकि बातचीत के रास्ते फिलहाल पूरी तरह बंद नजर आ रहे हैं। शहबाज शरीफ के इस रवैये ने यह साबित कर दिया है कि पाकिस्तानी नेतृत्व अभी भी अपनी पुरानी और संकीर्ण मानसिकता से बाहर निकलने के लिए तैयार नहीं है। भारत अपनी मजबूत और स्वतंत्र विदेश नीति के बल पर वैश्विक मंचों पर लगातार आगे बढ़ रहा है और देश की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर किसी भी प्रकार का समझौता न करने के अपने संकल्प पर पूरी तरह अडिग है। आने वाले दिनों में कूटनीतिक मोर्चे पर यह तनातनी और अधिक तेज होने के पूरे आसार बने हुए हैं।
अस्वीकरण (Disclaimer):
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