दिल्ली

अशांत क्षेत्र की घोषणा से नागालैंड और मणिपुर में सुरक्षा बल मुस्तैद

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने नागालैंड के नौ जिलों और मणिपुर के कई क्षेत्रों को एएफस्पा के तहत अगले छह महीनों के लिए अशांत क्षेत्र घोषित किया है।

By अजय त्यागी 1 min read
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प्रतीकात्मक फोटो

नई दिल्ली, भारत। पूर्वोत्तर भारत के सुरक्षा और प्रशासनिक तंत्र से जुड़ी इस वक्त एक बेहद अहम और बड़ी खबर सामने आ रही है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सुरक्षा स्थितियों की गहन समीक्षा करने के बाद नागालैंड राज्य के भीतर आने वाले नौ जिलों तथा पड़ोसी राज्य मणिपुर के विभिन्न हिस्सों को अशांत क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया है। इस नए आदेश के लागू होने के बाद से दोनों राज्यों के भीतर कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा बलों के पास विशेष और व्यापक अधिकार सुरक्षित बने रहेंगे।  [1]

विस्तृत दायरा

आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, इस विस्तारित आदेश के दायरे में नागालैंड के प्रमुख जिलों जैसे दीमापुर, निउलैंड, चुमौकेदिमा, मोन, किफिरे, नोकलक, फेक, पेरेन और मेलुरी को अशांत क्षेत्र में शामिल किया गया है। इसके अलावा कोहिमा, मोकोकचुंग, लोंगलेंग, वोखा और जुन्हेबोटो जिलों के चुनिंदा पुलिस थाना क्षेत्रों को भी अशांत क्षेत्र की इस विशेष सूची में जगह दी गई है। वहीं दूसरी ओर, मणिपुर के अधिकांश हिस्सों को भी सुरक्षा और शांति बनाए रखने के उद्देश्य से इसी दायरे में रखा गया है, ताकि किसी भी अप्रिय घटना से निपटने में कोई ढिलाई न बरती जाए।

कानूनी प्रावधान

सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम यानी एएफस्पा की धारा तीन के तहत केंद्र सरकार को यह पूर्ण अधिकार प्राप्त होता है कि वह किसी भी क्षेत्र की खतरनाक स्थिति को देखते हुए उसे अशांत घोषित कर सके। इस विशेष कानून के जरिए सेना और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को अशांत क्षेत्र में तलाशी लेने, बिना वारंट गिरफ्तारी करने और सुरक्षा खतरों से निपटने की व्यापक कानूनी छूट मिलती है। आलोचकों और मानवाधिकार संगठनों द्वारा इस कानून का लगातार विरोध किए जाने के बावजूद सरकार का यह तर्क है कि क्षेत्रीय स्थिरता और उग्रवाद पर पूरी तरह लगाम कसने के लिए यह कदम अनिवार्य रूप से उठाया जाना आवश्यक है।

समीक्षा बैठक

यह निर्णय हाल ही में दोनों राज्यों के भीतर सुरक्षा एजेंसियों, खुफिया रिपोर्टों और स्थानीय प्रशासन के साथ की गई उच्च स्तरीय बैठकों के बाद लिया गया है। गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने जमीनी स्तर के हालातों का बारीकी से आकलन करने के बाद ही एएफस्पा की इस अवधि को आगे बढ़ाने का अधिकारिक निर्णय लिया है। सरकार लगातार इस बात पर जोर देती रही है कि जैसे-जैसे पूर्वोत्तर के राज्यों में हालात पूरी तरह सामान्य होते जाएंगे, चरणबद्ध तरीके से इस तरह के विशेष कानूनों को हटाया भी जाएगा। हालांकि, नागालैंड और मणिपुर के कुछ संवेदनशील हिस्सों में अब भी सुरक्षा संबंधी चिंताएं बनी हुई हैं।

क्षेत्रीय स्थिति

नागालैंड के साथ-साथ मणिपुर में सुरक्षा व्यवस्था की वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस प्रकार के कठोर प्रावधानों को जारी रखना जरूरी समझा गया है। मणिपुर के चुनिंदा पुलिस थाना क्षेत्रों को छोड़कर शेष पूरे राज्य में यह कानून पूरी शक्ति के साथ अगले छह महीनों तक प्रभावी रहेगा। इन दोनों ही राज्यों में पिछले कुछ दशकों से विद्रोही समूहों और विभिन्न संगठनों के साथ राजनीतिक वार्ताओं का दौर भी समानांतर रूप से चल रहा है, लेकिन अंतिम और स्थायी समाधान की तलाश अभी भी पूरी तरह से जारी है, जिससे प्रशासन को पूरी तरह से सतर्क रहना पड़ रहा है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया

केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए इस कदम के बाद से क्षेत्रीय दलों और विपक्षी नेताओं की तरफ से तीखी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो चुकी हैं। स्थानीय राजनीतिक दलों का यह मानना है कि इस तरह के कड़े कानूनों के लंबे समय तक बने रहने से आम नागरिकों के दैनिक जीवन और लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके विपरीत, सुरक्षा विशेषज्ञों का यह स्पष्ट तर्क है कि जब तक सीमावर्ती इलाकों में पूरी तरह से शांति और विश्वास का माहौल स्थापित नहीं हो जाता, तब तक सुरक्षा बलों के हाथों को कमजोर नहीं किया जा सकता है। आने वाले महीनों में इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक सरगर्मी और अधिक तेज होने के पूरे आसार बने हुए हैं।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। इस रिपोर्ट में शामिल बयानों और दावों की पुष्टि हमारा संस्थान नहीं करता है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

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