दिल्ली के बहुचर्चित मेडिकल उपकरण खरीद घोटाले में मुख्य आरोपी राजीव कुमार रंगीला ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के समक्ष आत्मसमर्पण किया, एसीबी की कार्रवाई शुरू।
प्रतीकात्मक फोटो
नई दिल्ली, भारत। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों से इस वक्त एक बेहद सनसनीखेज और बड़ी खबर सामने आ रही है। दिल्ली सरकार के अस्पतालों में हुए छह सौ पचास करोड़ रुपये के मेडिकल घोटाला मामले में लंबे समय से फरार चल रहे मुख्य आरोपी राजीव कुमार रंगीला ने आखिरकार एसीबी की कार्रवाई के डर से अदालत और ब्यूरो के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। इस हाई-प्रोफाइल सरेंडर के बाद से राजधानी की राजनीति और प्रशासनिक विभागों में भारी हड़कंप मच गया है, और जांच एजेंसियों का शिकंजा अब और अधिक कसता हुआ नजर आ रहा है। [1]
प्राप्त विस्तृत जानकारियों के मुताबिक, यह पूरा बहुचर्चित मामला दिल्ली के विभिन्न सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा उपकरण और दवाइयों की खरीद-फरोख्त में बड़े पैमाने पर बरती गई वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा हुआ है। शुरुआती जांच में यह बात सामने आई थी कि नियमों को ताक पर रखकर चहेती कंपनियों को करोड़ों रुपए के ठेके बांटे गए थे, जिससे सरकारी खजाने को भारी चपत लगी थी। इस घोटाले के सामने आने के बाद से ही तमाम जांच एजेंसियां इस बात की गहराई से छानबीन कर रही थीं कि इस पूरे भ्रष्टाचार के खेल में पर्दे के पीछे कौन-कौन से बड़े अधिकारी और राजनेता शामिल थे।
भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो यानी एसीबी की कार्रवाई के अधिकारियों ने आरोपी के सरेंडर किए जाने के तुरंत बाद उसे अपनी हिरासत में ले लिया और पूछताछ का दौर शुरू कर दिया है। अदालत में पेश करने के बाद आरोपी को पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया है, जहां उससे इस मामले के अन्य मोर्चों और पैसों के लेनदेन के बारे में कड़ाई से पूछताछ की जा रही है। जांच एजेंसी का यह मानना है कि राजीव कुमार रंगीला से मिलने वाली जानकारियों के आधार पर इस सिंडिकेट से जुड़े कई अन्य छोटे-बड़े चेहरों के नाम भी जल्द ही बेनकाब हो सकते हैं, जिससे गिरफ्तारियों का दायरा और बढ़ सकता है।
इस हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारी और सरेंडर के बाद दिल्ली के राजनीतिक हलकों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर एक बार फिर से बेहद तेज हो गया है। विपक्षी दलों का यह कहना है कि इस बड़े भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं और पिछली सरकारों के संरक्षण के बिना इस तरह का घोटाला संभव ही नहीं हो सकता था। दूसरी तरफ, संबंधित पक्षों ने इन तमाम राजनीतिक बयानों को खारिज करते हुए जांच एजेंसियों को पूरी तरह स्वतंत्र रूप से निष्पक्ष कार्रवाई करने की बात कही है। जनता के बीच भी इस बड़े वित्तीय फर्जीवाड़े को लेकर भारी नाराजगी और उत्सुकता दोनों का माहौल साफ तौर पर देखने को मिल रहा है।
कैग रिपोर्ट और अन्य आंतरिक ऑडिट के दौरान यह खुलासा हुआ था कि अस्पतालों में उपकरणों की खरीद के लिए तय बाजार मूल्य से कई गुना अधिक भुगतान किया गया था। एसीबी की कार्रवाई के तहत इस बात के पुख्ता सबूत जुटाए जा रहे हैं कि किस प्रकार सरकारी धन का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया गया, जिसका खामियाजा अंततः आम जनता और मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। कागजी दस्तावेजों में हेराफेरी करके फर्जी बिल तैयार किए गए और बिना किसी वास्तविक आपूर्ति के ही करोड़ों रुपए के भुगतान कागजों पर ही पास कर दिए गए। वित्तीय मामलों के जानकारों का यह मानना है कि यह दिल्ली के इतिहास में सबसे बड़े घोटालों में से एक है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
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