Sun, 29 December 2024 11:49:51pm
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में हत्या, बलात्कार, डकैती जैसे गंभीर अपराधों में अभियुक्तों के जमानत आवेदनों पर विचार करते समय ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट को सतर्क रहने की सलाह दी है। अदालत ने कहा कि एक बार मुकदमा शुरू होने के बाद, इन मामलों में जमानत पर विचार करना उचित नहीं है, जब तक कि मुकदमे में अनावश्यक देरी न हो और वह भी आरोपी की गलती के बिना।
मुकदमे की प्रक्रिया और जमानत पर सुप्रीम कोर्ट की राय
जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने कहा, "आमतौर पर गंभीर अपराधों में, एक बार मुकदमा शुरू होने के बाद और अभियोजन पक्ष अपने गवाहों से पूछताछ शुरू कर देता है, तो अदालत को आरोपी की जमानत याचिका पर विचार करने में संकोच करना चाहिए।"
अनावश्यक देरी पर जमानत का आधार
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मुकदमे में अनावश्यक देरी होती है और वह भी आरोपी की गलती के बिना, तो अदालत को आरोपी के त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन मानते हुए जमानत पर विचार करना उचित हो सकता है।
पीड़िता के बयानों में विसंगतियों पर जमानत का आधार
सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार के एक मामले में हाई कोर्ट द्वारा आरोपी को जमानत देने के आदेश को अस्वीकार करते हुए कहा कि पीड़िता के बयानों में कथित विसंगतियों को जमानत देने का आधार नहीं माना जा सकता, विशेषकर जब पीड़िता से पूछताछ अभी बाकी हो।
ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के लिए दिशा-निर्देश
अदालत ने ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट को निर्देश दिया कि वे गंभीर अपराधों में जमानत पर विचार करते समय मुकदमे की प्रक्रिया को प्रभावित न करें और आरोपी के अधिकारों का उल्लंघन न होने दें।
न्यायिक प्रक्रिया में संतुलन की आवश्यकता
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश न्यायिक प्रक्रिया में संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को दर्शाता है, ताकि गंभीर अपराधों में आरोपी के अधिकारों का उल्लंघन न हो और न्याय की प्रक्रिया सुचारू रूप से चल सके।